रविवार, 24 मई 2009
रविवार, 15 मार्च 2009
स्टोव! मेरे सवालों का जवाब दो
मायके में क्यों नहीं ?
स्टोव तुम्हारी शिकार बहुएं ही क्यों होती हैं?
बेटियां क्यों नहीं ?
स्टोव तुम इतना भेदभाव क्यों करते हो ?
समझते क्यों नहीं ?
स्टोव कहां से पाई है तुमने ये फितरत ?
बताते क्यों नहीं ?
स्टोव तुम भीतर से इतने कमजोर क्यों हो ?
अक्सर फट जाते हो ?
स्टोव तुम हमेशा विस्फोट की ही भाषा क्यों बोलते हो ?
क्या तुम्हारे पास आंखें भी हैं ?
स्टोव तुम कैसे देख लेते हो किचन में बहू ही है ?
फटने का फैसला कर लेते हो ?
स्टोव तुम कैसे पहचान लेते हो अपने शिकार को ?
कौन बन जाता है तुम्हारी आंखें ?
स्टोव अब तुम इस कदर खामोश क्यों हो ?
बोलते क्यो नहीं ?
स्टोव यह तो बताओ तुम कब फटना बंद करोगे ?
कुछ तो जवाब दो ?
स्टोव बरसों से पूछ रहा हूं यह सवाल अब तो बोलो ?
अब तो यह राज खोलो ?
(बरसों पहले लिखीं थीं यह पंक्तियां। आज अचानक वह मुड़ा-तुड़ा कागज मिल गया। मेरे इन सवालों का जवाब अब भी नहीं मिला है। हां, कुछ फर्क जरूर आया है। अब स्टोव की जगह गैस सिलेंडर फटने लगे हैं)
बुधवार, 24 दिसंबर 2008
गधे का गुस्सा
एक गधा चुपचाप खड़ा था
एक पेड़ के नीचे
पड़ गए कुछ दुष्ट लड़के उसके पीछे
एक ने पकड़ा कान
दूसरे ने पीठ पर जोर जमाया
और तीसरे ने उस पर
कस कर डंडा बरसाया
आया गुस्सा गधे को
दी दुलत्ती झाड़
फौरन लड़के भागे
खाकर उसकी मार।
सोमवार, 25 अगस्त 2008
अफसोस बंटी, तुम नहीं रहे
अफसोस बंटी
तुम नहीं रहे
आखिरकार
दिल्ली पुलिस ने
तुम्हारी जान ले ही ली
पता नहीं कैसे
इस बार
कामयाब हो गई पुलिस
वर्ना हर बार तो
तुम ही जीतते थे बाजी
अफसोस बंटी
तुम नहीं रहे
अब टीवी चैनलों का क्या होगा?
वो किसे बताएंगे
बाइकर्स गैंग का सरगना
सड़क पर हुई
हर वारदात के लिए
किसे ठहराएंगे जिम्मेदार
हर राह चलते लुटेरो को
अब कैसे बताएंगे
बंटी गैंग का गुर्गा?
कैसे कहेंगे
जवाब दो दिल्ली पुलिस?
अफसोस बंटी
तुम नहीं रहे
गोली तो तुमने भी चलाई थी?
फिर कोई पुलिसवाले पर क्यों नहीं लगी
तुम्हारा निशाना तो बहुत सटीक है
फिर कैसे चूक गए तुम
कैसे हार गए तुम
अब टीवी चैनल वाले
किसके नाम पर फैलाएंगे दहशत
कैसे बताएंगे कि
रहने लायक नहीं रही दिल्ली
कैसे कहेंगे
दिल्ली में बढ़ रहे हैं अपराध
कैसे कहेंगे
घर से बाहर मत निकलिए
वर्ना लुट जाएंगे
अफसोस बंटी
तुम नहीं रहे
हमेशा याद आओगे तुम
खासतौर पर
चैनल वाले तो
तुम्हें भूल नहीं पाएंगे
जब भी कोई झपटमार पकड़ जाएगा
जब भी कोई लुटेरा धरा जाएगा
तो टीवी चैनल वालों को
खलेगी तुम्हारी कमी
वो बस यही बोलेंगे
काश! बंटी तुम होते
तो हम फौरन ये कह देते
खत्म नहीं हो रहा बंटी का खौफ
हाथ पर हाथ धरे बैठी है
दिल्ली पुलिस
कौन बचाएगा दिल्ली को
लेकिन...
अब ऐसा नहीं होगा
अब चैनलों पर नहीं गूंजेगे
तुम्हारी बादशाहत के किस्से
अब नहीं होगी
तुम्हारे खौफ की बात
अफसोस बंटी
तुम नहीं रहे
सचमुच बहुत याद आओगे बंटी...
मंगलवार, 20 मई 2008
अलगौझा*
चाचा आप क्यों गुस्सा हो गए?आप तो मुझे रोज चूमा करते थे
अब कटे-कटे से क्यों रहते हैं?
आपने चुन्नू भैया को डांटा क्यों नहीं?
उसने आपकी लाई मिठाई मुझे नहीं दी।
मुन्नी दीदी भी अब मेरे साथ लूडो नहीं खेलतीं
कहती हैं जाओ-अपने भाई के साथ खेलो
बताओ चाचा, तुम मुन्नी दीदी को डांटोगे न?
भला चाचा तुम्हें याद है कितने दिन हो गए
मुझे कंधे पर बिठाकर हाट घुमाए हुए
कोने वाले कमरे में अब ताला क्यों बंद रहता है?
वह तो हमारे खेलने का कमरा था
चाची तो मुझे गोद पर सुलाया करती थीं
उस दिन दुखते सिर को दबाने को कहा
तो क्यों झिड़क दीं?
जानते हो चाचा,
चाची के कमरे में जाने पर
सब मुझे सहमी-सहमी निगाह से देखते हैं
बताओ न चाचा, ऎसा क्यों हो रहा है?
मुझे बहुत डर लगता है।
**********************
बच्चा केवल सवाल करता है
वह नहीं जानता कि
आंगन वाली दीवार की ऊंचाई
कब दिलों को पार कर गई
(मेरे अजीज दोस्त प्रमोद कुमार की कविता जो प्रमोद ने मुझे 16-11-1998 को अपनी पाती के साथ वाराणसी से भेजी थी)
*विभाजन
शनिवार, 12 जनवरी 2008
शनिवार, 15 सितंबर 2007
हां, मैं भूत को जानता हूं !
मैं भूत को देखना चाहता हूं
मैंने भूतों के बारे में बहुत कुछ सुना है
मेरी नानी कहती थीं
भूत देखने में डरावना होता है
उसकी कोई आकृति नहीं होती
कोई निश्चित आकार भी नहीं होता
फिर भी लोग उससे डरते हैं
वह लोगों को डराता है
लेकिन क्यों?
यह मेरी नानी भी नहीं जानतीं
वह कहती थीं...
जब कोई इंसान बेमौत मर जाता है
तो भूत बन जाता है
वह भूत बनकर भटकता रहता है
मुक्ति की तलाश में
अब मेरी नानी इस जहां में नहीं हैं
मुझे उनकी सारी कहानियां याद हैं
वह कहानियां जिन्हें सुनकर
मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे
मैं डरकर उनकी गोद में दुबक जाता था
उन कहानियों में
एक से बढ़कर एक
भूत, राक्षस और दानव होते थे
उनके पास सारी शक्तियां होती थीं
अब मैं बड़ा और समझदार हो गया हूं
लेकिन अब भी सुनना चाहता हूं
भूतों की कहानियां
अब मेरी नानी नहीं हैं
फिर भी...
मैं भूतों से आये दिन रूबरू होता हूं
जब भी दिल करता है
भूतों के बारे में जानने का
फौरन सारी कड़ियां जोड़ लेता हूं
अरे यारों, अब भी नहीं समझे
बस टीवी पर कोई खबरिया चैनल खोल लेता हूं।
गुरुवार, 23 अगस्त 2007
कंपनी सार

हे पार्थ,
तुम्हें इंक्रीमेंट नहीं मिला, बुरा हुआ
टीडीएस बढ़ने से सैलरी भी कट गई, और भी बुरा हुआ
अब काम बढ़ने से एक्स्ट्रा शिफ्ट भी होगी, ये तो और भी बुरी बात होगी।
इसलिए हे अर्जुन,
न तो तुम पिछला इंक्रीमेंट नहीं मिलने का पश्चाताप करो
और न ही अगला इंक्रीमेंट मिलने का इंतजार करो
बस अपनी सैलरी यानी जो भी थोड़ा कुछ मिल रहा है उसी से संतुष्ट रहो
इंक्रीमेंट नहीं भी आया तो तुम्हारे पॉकेट से क्या गया
और जब कुछ गया ही नहीं तो रोते क्यों हो।
हे कौन्तेय,
एक बात याद रखो
जब तुम नहीं थे कंपनी तब भी चल रही थी
और जब तुम नहीं रहोगे तब भी कंपनी चलती रहेगी
कंपनी को तुम्हारी जरूरत नहीं, कंपनी तुम्हारी जरूरत है
वैसे भी तुमने कौन सा ऐसा आइडिया दिया जो तुम्हारा अपना था
सब कुछ तो कट-कॉपी-पेस्ट का ही खेल था
इस बात को लेकर भी दुखी मत हो कि कट-कॉपी-पेस्ट वाले आइडिया का क्रेडिट भी तुम्हें नहीं मिला
सारा क्रेडिट अगर बॉस मार लेते हैं तो उन्हें मारने दो
क्रेडिट मारना तो बॉस का हक है और यही एक काम वो ईमानदारी के साथ करते हैं।
हे पांडु पुत्र,
इन बातों के साथ ही एक बात ये भी याद रखो
तुम कोई एक्सपीरियंस लेकर नहीं आए थे
जो एक्सपीरियंस मिला यहीं पर मिला
कोरी डिग्री लेकर आए थे एक्सपीरियंस लेकर जाओगे
मतलब अगर नौकरी छोड़ी तो यहां से कुछ लेकर ही जाओगे
ये बताओ कि कंपनी को क्या देकर जाओगे।
हे तीरंदाज द ग्रेट,
जो सिस्टम (कम्प्यूटर) आज तुम्हारा है
वो कल किसी और का था....
कल किसी और का होगा और परसों किसी और का
तुम इसे अपना समझ कर क्यों मगन हो रहे हो
कुछ भी तुम्हारा नहीं है, सब एक दिन छिन जाएगा
दरअसल, यही तुम्हारे टेंशन का कारण है।
इसलिए हे धनंजय,
क्यों व्यर्थ चिंता करते हो
किससे व्यर्थ डरते हो
कौन तुम्हें निकाल सकता है
ये नौकरी तुम्हारी थी ही कब, ये तो सिर्फ और सिर्फ बॉस की मर्जी है
और जब नौकरी तुम्हारी है ही नहीं तो तुम्हें कौन निकाल सकता है और कौन तुम्हें निकालेगा।
हे पांडव श्रेष्ठ,
ध्यान से एक बात को समझो
पॉलिसी चेंज तो कंपनी का एक रूल है
जिसे तुम पॉलिसी चेंज समझते हो, वो दरअसल कंपनी की एक ट्रिक है
एक ही पल में तुम सुपर स्टार और हीरो नंबर वन बन जाते हो
और दूसरे ही पल वर्स्ट परफॉर्मर और कूड़ा नंबर वन हो जाते हो।
इसलिए हे गांडीवधारी,
इंक्रीमेंट, इनसेन्टिव, एप्रेजल, प्रोमोशन, रिटायरमेंट वगैरह वगैरह को मन से निकाल दो
ये सब न तो तुम्हारे लिए है और न तुम इसके लिए हो
हां, जब तक बॉस खुश है तबतक काम करो या न करो, जॉब सिक्योर है
फिर टेंशन क्यो लेते हो
तुम खुद को कंपनी और बॉस के लिए अर्पित कर दो
यही सबसे बड़ा गोल्डेन रूल है
जो इस गोल्डेन रूल को जानता है
वो इंक्रीमेंट, इनसेन्टिव, एप्रेजल, प्रोमोशन, रिटायरमेंट वगैरह वगैरह के झंझट से
सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
इसलिए हे धनुर्धर श्रेष्ठ,
चिन्ता छोड़ो और खुद को कंपनी के लिए होम कर दो
तभी जिन्दगी का सही आनन्द उठा सकोगे।
बुधवार, 22 अगस्त 2007
फिल्म सिटी का कुत्ता
उसने देखा है
हर प्रोड्यूसर को
'प्रोड्यूसर' बनते हुये।
हर पत्रकार को
'जर्नलिस्ट' में बदलते हुये।
उसने देखा है
बाटा की घिसी चप्पलों से
'वुडलैंड' तक का सफर
उसने देखा है
फुटपाथ की टी शर्ट से
'पीटर इग्लैंड' तक का सफर
उसने देखा है
घिसे टायरों वाली हीरो होंडा को
'होंडा सीआरवी' में बदलते हुये।
वह हर चैनल के प्रोड्यूसर को
अच्छी तरह पहचानता है
तभी तो
एंकर और प्रोड्यूसर को देखते ही
पूंछ हिलाता है
उन पर भोंकने की गुस्ताखी नहीं करता
वह भोंकता है
बाहर से आने वालों पर
लेकिन...
इस बात का इत्मीनान करने के बाद
कि वो शख्स भविष्य का
एंकर या प्रोड्यूसर तो नहीं है
वह बाहरी कुत्तों पर भी भोंकता है
वो कुत्ते...
जो उसकी तरह साफ-सुथरे नहीं होते
किसी चैनल के प्रोड्यूसर की तरह
खाये-पिये और तंदुरुस्त नहीं होते
वह खुद भी 'प्रोड्यूसर' की तरह ही है
खाया-पिया, अघाया, मुटाया
इसलिये उसे
मरियल और बीमार कुत्ते
अपनी बिरादरी के नहीं लगते
वह जोर से भोंक कर
उन्हें फिल्म सिटी से खदेड़ देता है
और अगले ही पल
चाय की दुकान पर खड़े
प्रोड्यूसर और एंकर के सामने
पूंछ हिलाने लगता है
मानो कह रहा हो...
मैंने अपना काम कर दिया प्रोड्यूसर साहब !
अब आप अपना काम कीजिये
बटर टोस्ट का एक टुकड़ा
मेरी तरफ भी फेंक दिजिये।
चाय की दुकान पर आने वाला
हरेक प्रोड्यूसर, एंकर, रिपोर्टर
उस कुत्ते को अच्छी तरह पहचानता है
क्योंकि वह कुत्ता
उनके बारे में सब कुछ जानता है।
शुक्रवार, 20 जुलाई 2007
उनका और तुम्हारा बचपन

कोमल, निर्मल, निश्छल, निष्काम बचपन
किसका ?...उनका, तुम्हारा या हमारा अपना
आता है बचपन जीवन में एक बार ही
इसलिये संभाल कर रखना इसको
क्यों न करो कुछ ऐसा
भूल न पाएं बचपन की स्वर्णिम यादें तुमको
सहेज कर रखना उन यादों को
उन बातों को
जो याद दिलाती रहें पल-पल तुमको
बचपन की, उस निर्मल, निश्छल जीवन की
यद्यपि है निश्चित
यह बचपन नहीं चलेगा सदा साथ तुम्हारे
वरन एक दिन ऐसा भी आयगा
जब तुम खुद को समझने लगोगे
समझदार, खुद्दार
आवश्यकता नहीं महसूस होगी तुम्हें
बड़े-बुजुर्गों की
उनकी सलाह की, मार्गदर्शन की
क्योंकि तुम खुद ही हो जाओगे बड़े
बेशक कैसा भी रहा हो तुम्हारा बचपन
लेकिन वह अब तो बीत ही गया है
यदि हो गया है अतीत में विलीन तुम्हारा बचपन
खो गया है समय के अंधकार में
तो क्यों न अब तुम ही
अपने आस-पास के, बिन मां-बाप के
बच्चों का बचपन सहेजो, संवारो, निखारो
शायद इसी में तुम्हारा बचपन संलिप्त हो
परंतु याद रखना सदा इस बात को
इसमें तुम्हारा कोई निज स्वार्थ न निहित हो
क्योंकि बचपन तो भोला है, निस्वार्थ है
भला उसका संसार के झंझावतों से क्या वास्ता?
क्यों न देखें हम बचपन को उनकी ही नजर से
हम भी दूर हो जाएं दुनिया की तमाम बुराइयों से
और हम भी अपने आप को
अपनी भावनाओं, इच्छाओं को ढालें उन्हीं के अनुसार
जो लड़ते हैं कभी आपस में
लेकिन, पल भर के बाद ही
खेलने लगते हैं फिर से मिल-जुलकर
सब कुछ भूलकर।
गुरुवार, 19 जुलाई 2007
जंगजू
बहुत बोलता था
आज खामोश था
वह इसलिए कि
ना आज उसको होश था
दे-देकर सबको गालियां
मोल लेता था बुराइयां
तभी तो
लोगों से पिट-पिटाकर
हड्डियां तुड़वाकर
अब...
वह निष्क्रिय सा पड़ा हुआ था
लगता जैसे मरा हुआ था
तभी मरे से उस शरीर में
हलचल थोड़ी सी हुई
हुआ अचानक खड़ा वह
अभी नहीं था मरा वह।
कल...
वह फिर मंच पर चढ़ा हुआ था।
अब मैं कविता नहीं लिखता
हो सकता है अब यह मुमकिन ही न हो
वास्तविकता कुछ भी हो
लकिन यह सच है कि
अब मुझे यह गलतफहमी नहीं है
कि मेरे भीतर भी एक कवि है।
अब मैं कविता नहीं लिखता
लेकिन पहले ऐसा नहीं था
मुझे भी यह गुमान था
कि मेरे अंदर भी एक कवि है
तब मुझे हर चीज में
कविता नजर आती थी
शब्दों की तुकबंदी
मुझे भी बहुत सुहाती थी
पर्वत, झरने, नदियां, परिंदे
ये सब मुझे बहुत लुभाते थे
शब्दों की लड़ियां
खुद-ब-खुद जुड़ जाती थीं
लेकिन...अब ऐसा नहीं होता
अब मैं कविता नहीं लिखता
क्योंकि अब प्रकृति मुझे नहीं लुभाती
चिड़ियों की चहचहाहट नहीं सुहाती
अब मैं प्रेम की परिभाषा को समझने
या समझाने की कोशिश नहीं करता
जिंदगी के स्याह पहलुओं पर
अपना सर नहीं खपाता...
रास्ते पर पत्थर तोड़ती औरत
मैले-कुचैले कपड़ों में खेलते बच्चे
या किसी मजलूम का करुण क्रंदन
अब मुझे परेशान नहीं करते
क्योंकि...
अब मैं कविता नहीं लिखता।
और हां,
अब मैं 'फटीचर राइटर' नहीं कहलाता
साइकिल से नहीं, कार में चलता हूं
भले ही अब मैं
प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन नहीं कर पाता
जिंदगी की पहेलियों को नहीं सुलझा पाता
लेकिन लिखता मैं अब भी हूं
अब मेरी उंगलियां कागज पर नहीं
कंप्यूटर पर थिरकती हैं।
अब मैं कविता नहीं लिखता।
अब मैं नाग-नागिन के प्रेम
और बदले की कहानियां लिखता हूं
भूतों के नाच, चुड़ैल का खौफ
तंत्र-मंत्र की कहानियां
मैं बाखूबी बयां करता हूं
सांप-नेवले की लड़ाई
पागल कुत्ते का कहर
और मियां-बीवी के झगड़े
ये अब मेरे मेरे मनपसंद विषय हैं
जी हां, अब मैं 'स्क्रिप्ट' लिखता हूं
मैं एक खबरिया चैनल में
'प्रोड्यूसर' हो गया हूं
इसलिए...
अब मैं कविता नहीं लिखता।
खबर तूने क्या किया
एक खबर हमसे आ टकराई
खबर का हाल काफी बुरा था
सीने में छह इंच का छुरा था
हमने पूछा अरे खबर कहां चली
बोली अखबार के दफ्तर की गली
हम चकराये
उसकी मूर्खता पर झल्लाए
हमने कहा-
अखबार का दफ्तर छोड़ो
खबरिया चैनलों का पता लो
और सीधे स्टूडियो पहुंच जाओ
हमने मन में सोचा
कि इस खबर में ड्रामे के पूरे चांस हैं।
मुंह में आह और सीने में खंजर
चैनल के लिए बेहद मुफीद है ये मंजर
इस बार हमने उसे समझाया-
तुम्हारी तो किस्मत ही बदल जाएगी
हर घर में बस तुम ही नजर आओगी
कुछ समझी
रिकार्ड तोड़ टीआरपी पाओगी
रातोंरात हिट हो जाओगी
देर मत करो वर्ना पछताओगी।
लेकिन वह बेचारी तो नासमझ निकली
हमारी नेक सलाह उसके भेजे में नहीं घुस पाई
शायद इसीलिये...
उसे यह बात समझ में नहीं आई
उसने अपनी लाल दहकती आंखें तरेरीं
और अखबार के दफ्तर की तरफ हो ली
अगले दिन जब हमने अखबार उठाया
तो खबर को महज सिंगल कॉलम में पाया
उसकी नासमझी पर हमें बेहद तरस आया
सचमुच जिसे चैनल वाले घंटों तान सकते थे
उसने सिंगल कॉलम में छपकर
अपनी अहमियत को खुद ही घटाया।
मंगलवार, 17 जुलाई 2007
क्या यह मुमकिन है?
तुमने कह दिया
मुझे भूल जाओ।
अब अपनी जिंदगी में
किसी और को ले आओ
ये चंद अल्फाज कहते हुये
क्या तुमने नहीं सोचा
इतना आसान होता है
किसी को भूल जाना?
कोशिश करके कई बार देखा है
अब तक तो तुम्हें नहीं भूल पाया
तुम तो मेरी रग-रग में समाए हो
फिर भला मैं तुम्हें
कैसे खुद से जुदा करूं?
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
क्या यह मुमकिन है
कि अपनी जिंदगी में
अब किसी और को ले आऊं?
सोमवार, 16 जुलाई 2007
अपने-अपने भंवर

सवाल रूपी दोराहे पर खड़ा
वैचारिक मतभेद और
मानसिक द्वंद रूपी चौराहे की भीड़ में उलझा
सत्य-असत्य के आक्षेपों से जूझता
अनिश्चितताओं के भंवर में डूबता-उतराता
तीक्ष्ण अकाट्य तर्कों से
कतरा कर गुजरने के प्रयास में है व्यक्ति
व्यक्ति, जो कहता कुछ है, करता कुछ है
पर हो कुछ और जाता है
व्यक्ति जो गिरता जा रहा है
निर्जन, अंधेरी, भयावह खाई में
घिरता जा रहा है
क्षुद्र मानसिक, सांसारिक स्वार्थों के
अनजान भंवर में
भंवर विचारों का है, भंवर संस्कारों का है
सभी का अपना अंर्तद्वंद है
अपने-अपने भंवर हैं।
कोई प्यार के गागर में
तो कोई नफरत के सागर में
आकंठ डूब जाना चाहता है
शायद इसी माध्यम से मोक्ष पाना चाहता है
क्या यह मात्र एक व्यक्ति का मानसिक उद्देग है?
यकीनन नहीं...
आम आदमी की आंखों से
सपने भी चुरा लेने को तत्पर
यह आज के तथाकथित सभ्य लोगों की वास्तविकता है
जो अग्रसर हैं विकास में और चढ़ चुके हैं ऊंची सीढ़ियां
छूकर असीम ऊंचाइयां, नाप चुके हैं अनंत गहराइयां
लेकिन, ये क्या नाप पाए हैं
किसी के अंतर्मन को
भांप पाए हैं किसी असहाय दिल के
दुखद रूदन को?
समझ पाए हैं
किसी लाचार के करुण क्रंदन का अर्थ?
या फिर पढ़ पाये हैं
किसी की सूनी आंखों की भाषा?
बेशक नहीं...।
तो फिर किस चिकित्साशास्त्र की बात करते हैं?
अरे, दिल के भीतर जाने से डरते हैं
और दिलों का इलाज करते हैं...?
मंगलवार, 10 जुलाई 2007
अजनबी परछाई
किसी परछाई को देखकर
मैं अक्सर बहुत खुश हो जाता हूं
परछाई को निहारता हूं
उसके नजदीक आने का इंतजार करता हूं
परंतु अमूमन निराश हो जाता हूं
क्योंकि वह वास्तव में वह नहीं होता
जो दिखाई देता है
या फिर...
शायद मेरी ही आंखें धोखा खा जाती हैं
मन जिसे चाहता है
उसी का दीदार करती हैं
शायद मेरी खुशी के खातिर
मेरी आंखें मुझे ही भरमा देती हैं
अपनी आंखों की ये कोशिश
मुझे जरा भी नहीं भाती
क्योंकि आंखें खुलने पर
जब सामने कोई नजर नहीं आता
तब मुझसे मुखातिब होती है सच्चाई
जिससे मैं नजरें चुराने की कोशिश करता हूं
क्या करूं?
मेरे साथ अक्सर ऐसा ही होता है
जब मैं इस सच्चाई को नहीं समझ पाता
और हर बार खुश हो जाता हूं
एक और अजनबी परछाई को
अपनी ओर आता हुआ देखकर।(1997)
मंगलवार, 3 जुलाई 2007
मैं जानता हूँ
दस्तक दूं
अपने आप को मेहमान बताऊं
तो तुम दौड़कर
मेरा स्वागत नही करना
भगवान के बराबर तो क्या
तुम मुझे किंचित मात्र भी महत्व नहीं देना
मेरे सम्मान में
पलक-पावडे़ भी नहीं बिछाना
हो सके तो मुझे दुत्कार देना
यदि ऐसा कराने में संकोच हो तो
मुझे वापस लौटाने के लिए
मन मुताबिक तरकीबें अपनाना
खाने के लिए भी पूछ्ने की जरुरत नहीं
फिर भी मैं
बेशर्मी से खाना माँग ही लूं
तो तुम्हारे रसोई घर में
बासी रोटियां तो पड़ी ही होंगी
मुझे वही खिला देना
ज्यादा सूखी हों तो पानी लगा देना
यदि मैं
खाने की शिकायत करने जैसी धृष्टता करूं
तो तुम गुस्से ते आग-बबूला मत होना
बस कोई प्यारा सा बहाना बना देना
मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगा
क्योंकि मैं जानता हूं कि
मेहमान को भगवान समझाने की
मूर्खता करना
उसकी सेवा में
अपना अमूल्य समय बरबाद करना
ये सब पुरानी परम्पराएं हैं
पिछड़ेपन की निशानी हैं
मैं ये भी जानता हूँ कि
तुम इनके चक्कर में नहीं पड़ोगे
क्योंकि तुम तो आधुनिक हो
पुरानी सड़ी-गली परम्पराओं में
विश्वास नहीं रखते।(1998)
सोमवार, 2 जुलाई 2007
अनकही
गुरुवार, 28 जून 2007
चार लाईना
तब कहने को दिल में कुछ रहती नहीं बातें थीं
अब कहने को उनसे कितनी ही बातें हैं
लेकिन अब नहीं होती मुलाकातें हैं. (1995)
क्रिकेट का बुखार
दौडा-दौडा आया
फिर झटपट
पिच पर उसने
स्टंप लगाया।
लो हो गया तैयार विकेट
अब खेला जायेगा क्रिकेट।
दो बल्लेबाज़
जो दिखते थे उस्ताद
बैट लेकर दौड़ते आये।
किस्मत पर अपनी इतराए
एक ने आकर बैट जमाया
दूजा रनर बनकर आया।
गेंदबाज
गेंद लेकर घिसता आया
अपनी की रफ्तार तेज़
गेंद दी तेज़ी से फ़ेंक
बल्लेबाज़ संभला
घुमाया बल्ला मारा छक्का
गेंदबाज यह देखकर
गया हक्का-बक्का।
तब, दर्शक दीर्घा से
तालियों की आवाज आयी
गेंद की होने लगी धुनाई
देखते ही देखते
स्कोर बोर्ड पर
रनों का अम्बार हो गया
दर्शक बैठे खुश होते थे
क्रिकेट का दीदार हो गया।
जिधर भी देखो क्रिकेट-क्रिकेट
क्रिकेट का बुखार हो गया
क्रिकेट चाहे जिस दिन भी हो
वह दिन तो इतवार हो गया.(1994)


रविवार, मई 24, 2009
Unknown

