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शनिवार, 6 मार्च 2010

बीबीसी मुझे माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक सवाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही सम्मान का हकदार बनाते हैं। लेकिन बीबीसी के लिए एक आतंकवादी भी सम्मानित है। कल्पना कीजिए कि अगर मुंबई हमले का गुनहगार आमिर अजमल कसाब बीमार हो जाए तो उसके बारे में लिखी गई बीबीसी की खबर का शीर्षक क्या होगा। शायद वह लिखेगा, 'बीमार हैं कसाब' या फिर 'बीमार हुए कसाब'। अब आप सोचिए कि कसाब के बारे में ऐसा संबोधन पढ़कर एक हिंदुस्तानी को कैसा लगेगा? हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बीबीसी के इन भाषाई तौर-तरीकों में कोई बुराई नजर नहीं आती। वो बड़ी ही बेशर्मी से इसे बीबीसी की 'निष्पक्ष' पत्रकारिता कहते हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वो महात्मा गांधी के हत्यारे के लिए ऐसा सम्मानजनक संबोधन पसंद करेंगे? क्या वो इंदिरा गांधी के कातिल के लिए 'उन्हें' या 'वे' जैसे संबोधन स्वीकार कर पाएंगे?

टीवी चैनलों को भाषा ज्ञान देने वाले इस मुद्दे पर मौन हो जाते हैं। शायद उन्हें लगता है कि वो बीबीसी पर सवाल उठाएंगे तो 'सांप्रदायिक' की श्रेणी में आ जाएंगे। अन्यथा वो थोड़ा सा भाषा ज्ञान बीबीसी को भी क्यों नहीं देते? रुचिका मामले में सबने देखा कि मीडिया की भाषा कैसे रातोंरात बदल गई। जैसे ही हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर की कारगुजारी दुनिया के सामने आई, वो मीडिया की नजर में सबसे बड़ा खलनायक बन गया। एक दिन पहले तक वो महज आरोपी 'थे', लेकिन 24 घंटे बाद ही वो 'गुनहगार' हो 'गया'। चैनल में साफ-साफ 'उसे' रुचिका का गुनहगार कहा जाने लगा। यहां भी यही साबित हुआ कि व्यक्ति के कर्म ही उसे सम्मान का हकदार बनाते हैं। जैसे ही राठौर के कुकर्म उजागर हुए, मीडिया ने उसके लिए सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करना भी बंद कर दिया।

कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि भाषा सबके लिए एक समान होनी चाहिए। सभी को सम्मान पाने का हक है। बात ठीक है लेकिन उस व्यक्ति को सम्मान पाने लायक भी तो होना चाहिए। हिंदी में अंग्रेजी जैसा नहीं है। इसीलिए हिंदी में दो तरह के संबोधन हैं। तुम और आप। अंग्रेजी में ऐसा कुछ नहीं है। अंग्रेजी में किसी एक व्यक्ति (एक वचन) के लिए 'हैं' या 'वे' नहीं लिखा जाता। इसलिए अगर अंग्रेजी मानसिकता वाले हिंदी में वेबसाइट चलाते हैं तो उन्हें हिंदी भाषा के 'नेचर' और जनमानस का खयाल रखना ही होगा। सिर्फ ये कहकर नहीं बच सकते कि ये तो हमारी 'स्टाइल शीट' है। सवाल ये है कि स्टाइल शीट अगर है भी तो ऐसी क्यों है जिसमें एक आतंकी को सम्मानजनक विशेषण दिया जाता है? वेबसाइट हिंदी में है और हिंदी का पाठक यह कतई नहीं कबूल कर सकता कि लादेन के लिए लिखा जाए कि 'वो ऐसे दिखते होंगे?'

एक साहब हैं जो रोज बीबीसी पढ़ते हैं लेकिन उन्हें आज तक बीबीसी की भाषा में कोई खामी नजर नहीं आई। उल्टा वो हमें दोष देने लगे कि ये आपकी 'सोच' और देखने के नजरिये का दोष है। भई, अगर मुझे लादेन जैसे आतंकवादी को सम्मान देने में आपत्ति है तो मेरी 'सोच' खराब कैसे हो गई? फर्ज कीजिए अगर मैं उन साहब का और उनके परिवार का दुश्मन बन जाऊं। उनको और उनके पूरे परिवार को जान से खत्म करने की ठान लूं। उनके एक-दो रिश्तेदारों को मौत के घाट भी उतार दूं। तब क्या उनके दिल में मेरे लिए कोई सम्मान रहेगा? शायद नहीं। तो सवाल ये है कि हजारों-लाखों बेकसूर लोगों की जान लेने वाला आतंकी लादेन कैसे सम्मानित संबोधन का हकदार हो सकता है?

इसी तरह अगर हिंदी में खबर लिखी जा रही है और जिक्र महात्मा गांधी की मौत का हो रहा है तो नाथूराम गोडसे क्या सम्मानित संबोधन का हकदार हो सकता है? लादेन को 'हैं' और 'वे' जैसे संबोधन किसी भी कीमत पर नहीं दिए जा सकते। बीबीसी हिंदी की भाषा के पैरोकारों से मैं कहना चाहूंगा कि जरा आत्मविश्लेषण करके देखें कि निचले तबके में रहने वाले और उनकी नजर में साफ-सफाई जैसे तुच्छ काम करने वाले लोगों को वो कितनी बार 'आप' कहकर संबोधित करते हैं, जबकि हकीकत तो ये है कि वो लोग सम्मान के पूरे हकदार हैं क्योंकि वह अपना काम ईमानदारी से करते हैं। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। इसके बावजूद हकदार होते हुए भी हम उन्हें सम्मान देने में कतराते हैं। इसके विपरीत कातिल, गुनहगार और आतंकी को सम्मान देने में उन्हें बुराई नजर नहीं आती? शायद इसलिए क्योंकि ऐसा एक विदेशी संस्था कर रही है और विदेशी जो भी करते हैं वो ऐसे लोगों को महान नजर आता है। ऐसे लोगों को वो सिर आंखों पर बैठाते हैं। वह कचरा भी परोसे तो हमें सोना लगता है। ऐसे लोगों के लिए तो हम यही कहेंगे कि उन्हें अपनी आंखें खोलनी चाहिए और दिमाग के बंद दरवाजे को भी खुला रखना चाहिए।

कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने तो मुझ पर एक अजीबोगरीब आरोप मढ़ डाला। वो खुद को सेकुलर साबित करना चाहते थे लिहाजा उन्होंने हम पर आरोप लगा दिया कि हम बीबीसी हिंदी पर ऐसे सवाल इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि उसकी संपादक सलमा जैदी एक मुसलमान हैं। इसी आधार पर उन्होंने हमें दक्षिण चरमपंथी भी घोषित कर दिया। हमें तो तरस ही आई उनकी सोच पर। उन्होंने बीबीसी की एक-दो खबरों का उदाहरण देकर ये भी साबित कर दिया कि चूंकि बीबीसी बाला साहेब ठाकरे के लिए भी सम्मानजनक संबोधन इस्तेमाल करता है इसलिए लादेन भी सम्मान का हकदार है। चूंकि वो यह मान चुके हैं कि बीबीसी की भाषा पर सवाल उठाने वाला एक दक्षिण चरमपंथी है, इसीलिए शायद उन्होंने बाल ठाकरे का उदाहरण पेश किया। इस पर मैं कहना चाहूंगा कि बाल ठाकरे हों या राज ठाकरे अगर कोई संगीन गुनाह करते हैं तो वो भी सम्मान के जरा भी हकदार नहीं है। एक और साहब ने इसे बीबीसी की निष्पक्ष पत्रकारिता बताया। यानी आतंकी का सम्मान करना उनकी नजर में निष्पक्ष पत्रकारिता की श्रेणी में आता है। उन्होंने ये भी तर्क दिया कि पत्रकार को किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। लेकिन जरा आप ही सोचिए कि लादेन के बारे में लिखते वक्त क्या पक्ष और विपक्ष की गुंजाइश रहती है?

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों?

कुछ दिन पहले कई चैनलों वाले बड़े मीडिया ग्रुप के एक छोटे या फिर कहें मंझोले हिंदी चैनल के संपादक को पढ़ रहा था। वह छोटे और मध्यम श्रेणी के चैनलों की परेशानियां गिना रहे थे। उनका कहना था कि छोटे चैनलों की कई मजबूरियां हैं। बकौल संपादक, छोटे चैनल कितना भी अच्छा कर लें, उनका काम उतना नोटिस में नहीं आता जितना कि बड़े चैनलों का। संपादक महोदय की इस बात से असहमत होने की कोई वजह नहीं है। लेकिन इन्हीं तथाकथित मजबूरियों की आड़ लेकर ये छोटे चैनल कुछ भी करने को उतारू हो जाते हैं। छोटे और मंझोले चैनल किस तरह खबरों के साथ खिलवाड़ करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है।

एक छोटे चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चली। दिल्ली में मिली अज्ञात लाश। लाश किसकी है। मौत कैसे हुई। किसकी हुई। क्यों हुई। कुछ नहीं मालूम। इसके बावजूद देखते ही देखते यह खबर सभी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज बनकर चलने लगी। जो खबर किसी अखबार में संक्षिप्त तो क्या बमुश्किल सिंगल कॉलम में छपती और सिर्फ दो-तीन लाइन में खत्म हो जाती, वो चैनलों के लिए ब्रेकिंग न्यूज है। अब सवाल यह उठता है कि अगर अज्ञात लाश मिलना ब्रेकिंग न्यूज है तो रोजाना सैकड़ों ब्रेकिंग न्यूज सिर्फ अज्ञात लाश की ही चलनी चाहिए। कहीं से भी ये डेटा निकाला जा सकता है कि रोजाना हर शहर में एक-दो अज्ञात लाश तो मिल ही जाती हैं। तब तो सभी अज्ञात लाशें ब्रेकिंग न्यूज हैं? आखिर जब तक लाश के पीछे से कोई स्टोरी नहीं निकल के आती तो वह खबर चैनल की मुख्य खबर कैसे बन सकती है? इस लिहाज से देखा जाए तो खुद को नेशनल कहने वाले इन न्यूज चैनलों के हिसाब से उस वक्त देश की सबसे बड़ी खबर वही होती है?

हिंदी न्यूज चैनलों में भेड़चाल का तो कोई जवाब ही नहीं। एक चैनल पर कोई खबर चलती है और अगले ही पल वही खबर सभी चैनलों पर ब्रेकिंग बनकर नजर आने लगती है। कोई चैनल यह तक पता करने की जहमत नहीं उठाता कि खबर सच भी है या नहीं। अगर झूठ निकली तो सिर्फ बेशर्मी से उसे हटा लिया जाता है। इससे ज्यादा ये चैनल कुछ कर भी नहीं सकते। उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए।

एक खबर चलती है तो दूसरे चैनल में उसी वक्त वही खबर चलाने की हड़बड़ी मच जाती है। समझ में यह नहीं आता कि अगर कोई खबर चैनल पर पहले से चल रही है तो दूसरे चैनल उसे कॉपी करने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाते हैं? क्या वो यह सोचते हैं कि उनके चैनल पर वही खबर चलेगी तो दर्शक उस चैनल को छोड़कर उनका चैनल देखने लगेंगे? दर्शकों को भी तो वेराइटी चाहिए या नहीं? सभी चैनलों पर एक वक्त में एक ही खबर चलेगी वो भी अज्ञात लाश मिलने जैसी तो जरा सोचिए कोई न्यूज चैनल क्यों देखेगा। दिल्ली या नोएडा में अज्ञात लाश मिली तो मुंबई, पटना या रायबरेली में बैठे दर्शक को उससे क्या मतलब है? मतलब इसलिए भी नहीं हो सकता क्योंकि चैनल के पास उस लाश के बारे में कोई जानकारी नहीं है। हो सकता है वह कोई नशेड़ी हो, गंजेड़ी हो? चैनल तर्क दे सकते हैं कि नशेड़ी गंजेड़ी का मरना भी तो खबर है। जरूर है। लेकिन पता तो हो कि अमुक व्यक्ति नशेड़ी है। गंजेड़ी है। चैनल को तो उसके बारे में कुछ भी नहीं पता। फिर भी वह ब्रेकिंग न्यूज है।

कई बार चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज चलाने की इतनी हड़बड़ी होती है कि ठीक से खबर कन्फर्म तक नहीं की जाती। दूसरा चैनल चला रहा है, इसलिए चलाना है। फौरन चलाना है। पता नहीं इसके पीछे क्या सोच है? भले ही खबर बाद में गलत निकले। झूठी निकले। मुंबई हमला, दिल्ली बम धमाके जैसी बड़ी घटना या बड़ी खबर सभी चैनलों पर एक साथ चले तो समझ में आता है क्योंकि ऐसी खबर लगातार अपडेट होती रहती है। किसी चैनल के पास कोई इन्फार्मेशन होती है तो किसी दूसरे के पास कोई और। दर्शक भी ज्यादा से ज्यादा जानने के लिए चैनल बदलता रहता है। लेकिन हर खबर को एक ही तराजू से तौलने की आदत के पीछे आखिर कौन सा तर्क है? आखिर यहां कौन सी मजबूरी है? दूसरे चैनल को फॉलो करके क्या कोई चैनल ये साबित कर सकता है कि वह सबसे तेज है। कतई नहीं। फिर यह अफरा-तफरी आखिर क्यों?

संपादक महोदय, जब आप अफरा-तफरी मचा कर रखेंगे। बड़े चैनलों को फ़ॉलो ही करते रहेंगे। तो आपको कोई नोटिस भी करे तो क्यों? क्या भेड़चाल वाले इन चैनलों में से कोई यह दावा कर सकता है कि वह सबसे अलग है उसे ही देखें? जो अलग है वह देखा जाता है। यह फैक्ट है। इंडिया टीवी इसका उदाहरण है। यह अलग बात है कि अलग दिखने के लिए इंडिया टीवी वह दिखाता है जो खबर नहीं होती। कई बार दर्शकों से धोखा किया जाता है। लेकिन अलग करेंगे तो देखे जाएंगे। यह साबित हो चुका है। इसलिए चैनलों के संपादकों से गुजारिश है कि दूसरे चैनलों को फॉलो करने की बजाय अलग करें, अलग सोचें। उसके बाद आप जरूर देखे जाएंगे। जो पेश करें वह सच हो तो और भी बेहतर। झूठ दिखाएंगे तो एक न एक दिन एक्सपोज हो ही जाएंगे।

शनिवार, 9 मई 2009

...तो फिर कौन है असली पप्पू?

-प्रशांत

अगर आप भारत के नागरिक हैं और लोकसभा चुनावों में वोट डालने नहीं जाते हैं, तो आप पप्पू हैं, ये हम नहीं कह रहे चुनाव आयोग की ओर से जारी सारे विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है... लेकिन आप अगर पोलिंग बूथ पर जाएं, आपके पास मतदाता पहचान पत्र भी हो और पिछले कई चुनावों से आप वोट डालते रहे हों, और तब भी आपको वोट देने का मौका नहीं मिले, तो आप क्या कहेंगे। पप्पू कौन?

इससे भी बड़ी बात तो ये कि आप उस जगह के स्थायी निवासी हों, आपके नाम पर एक अदद घर भी हो, आपके नाम से बिजली विभाग ने मीटर लगा रखा हो,आप करीब 9 साल से एक ही जगह पर रह रहे हों, आप कई बार वोट डाल चुके हैं और तब भी आपका नाम वोटर लिस्ट से गायब हो, तब भी क्या आप पप्पू कहलाएंगे।

एक और दृश्य-आप बिना वोट डाले लौटकर घर आ रहे हों और आपकी बिल्डिंग की कभी रखवाली करने वाला एक नेपाली चौकीदार रास्ते में मिल जाए और ये कहे, कि सर, वोटर लिस्ट में हमारा भी नाम है, तब आपको कैसा लगेगा?

जी हां, मैं किसी और की नहीं अपनी आपबीती बयान कर रहा हूँ। गुरुवार 7 मई को चौथे चरण में गाजियाबाद में वोट डाला गया। एक पढ़ा-लिखा शहरी होने के नाते मैं भी सुबह उठकर वोट डालने के इरादे से पोलिंग बूथ पर गया। मेरे हाथ में भारत के चुनाव आयोग की ओर से जारी मतदाता पहचान पत्र था। हां भाग संख्या पता नहीं था, लेकिन अपने याददाश्त के मुताबिक और अपनी बिल्डिंग के दूसरे लोगो से मिली जानकारी के आधार पर अपने क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर पहुंच गया। वहां बूथ के बाहर बैठे पोलिंग एजेंट से पूछा कि भाई मेरा नाम किस लिस्ट में है और किस बूथ नंबर पर मुझे वोट डालना है, अपनी सूची में देखकर ये बता दो। वहां बेतहाशा भीड़ मौजूद थी, लोग अपने अपने बूथ के बारे में जानकारी हासिल करने की होड़ लगाए थे। धक्का मुक्की हो रही थी, पहले तो मैं, इस अफरा-तफरी में थोडा पीछे हो लिया और अपनी बारी का इंतजार करने लगा।

काफी देर इंतजार करने के बाद भी जब मेरी बारी नहीं आई, तो मैं आगे बढ़ा और एक बार फिर पोलिंग एजेंट से आग्रह किया। फिर वही हाल... करीब घंटाभर गुजर जाने के बाद मेरा धैर्य जवाब देने लगा, तो मैं भी बाकी लोगों की तरह जबरदस्ती घुस गया। तब जाकर पोलिंग एजेंट को इस बात का ख्याल आया कि मैं काफी देर से खडा हूं। उसने मेरा कार्ड देखा और ये कह चलता किया कि आपका नाम इस बूथ पर नहीं, दूसरे बूथ पर है।

वोट देने की लालसा लिए मैं दूसरे बूथ पर जा पहुंचा। वहां भी वैसा ही हाल नजर आया। फिर मैं पोलिंग एजेंट से आग्रह कर खड़ा हो गया। काफी देर इंतजार करने के बाद भी जब बात नहीं बनी, तो उससे कड़क आवाज में कहा कि भाई आखिर तुमने ये लाइन क्यों लगा रखी है, जब अपने पहचान वालों का ही नाम तुम्हें बताना है, तो यहां एक बोर्ड टांग दो कि यहां सिर्फ पहचानवालों की ही पर्ची दी जाती है। कृपया दूसरे लोग यहां लाइन में ना लगें। मेरे इन सवालों ने उसे थोड़ा सचेत किया और वो मेरे जैसे कई लोगों से वोटर कार्ड लेकर सूची में नाम तलाश करने लगा।

काफी देर बाद मेरी बारी आई। तो उसने एक-एक कर सभी सूचियों में खोज डाला, लेकिन मेरा नाम कहीं नहीं था। मैं हैरान रह गया कि पिछले कई चुनावों में वोट डाल चुका हूं और मेरे पास मतदाता पहचान पत्र भी है, लेकिन इस बार क्या हो गया कि मेरा नाम नहीं है।

लेकिन मैं भी हार मानने को तैयार नहीं था, हर कीमत पर अपना नाम खोज वोट डालना चाहता था। मैं पहुंच गया पोलिंग बूथ के अंदर कि शायद वहां पता चल जाए। बूथ के अंदर कुछ कर्मचारी बैठे थे, जिनके पास पूरी सूची मौजूद थी। लोग अपने-अपने नाम खोजने का आग्रह कर रहे थे, तो कुछ नाम नहीं मिल पाने को लेकर बहस भी कर रहे थे। सबकी जुबां पर एक ही सवाल था, कि पिछले कई चुनावों में नाम मौजूद था, वोट भी डाला है और वोटर आईकार्ड भी है, तब मेरा नाम क्यों नहीं है। बाकी लोगों की तरह मैंने भी उस कर्मचारी से नाम खोजने का आग्रह किया, तो उनका सवाल था कि भाग संख्या और वोटर संख्या बताईए। उन्हें शायद इस बात का ध्यान नहीं रहा कि अगर भाग संख्या और वोटर संख्या पता होता तो, मुझे उनके पास जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती। मैं सीधे बूथ पर जाता और वोट डाल अपने घर लौट जाता।

जब वहां भी कुछ पता नहीं चल पाया, तब बूथ के अंदर गया, वहां एक बूथ खाली था, जहां कोई वोटर मौजूद नहीं था। मैंने वहां मौजूद पुलिस बल से गुजारिश की, तो उन्होंने अंदर जाने की इजाजत दे दी। मैं अंदर जाकर पोलिंग कर्मचारियों से बात की कि मेरे पास वोटर आईकार्ड है, लेकिन सूची में मेरा नाम नहीं मिल पा रहा, क्या कोई तरीका है कि आईकार्ड को देखकर इससे अंदाजा लगाया जा सके कि आखिर किस सूची में मेरा नाम होगा। तो उस सज्जन ने कहा कि नहीं वोटर कार्ड से कुछ पता नहीं चल पाएगा। आपको भाग संख्या पता करना होगा।

थक हार कर करीब चार घंटे की मशक्कत के बाद मैं बिना वोट डाले घर लौटने लगा। लेकिन एक पत्रकार के मन को ये नहीं भाया। सोचा कुछ दूसरे बूथों का चक्कर लगा लिया जाए। क्या पता यहां की तरह दूसरे बूथों पर भी कुछ ऐसा ही हाल हो। आसपास के करीब पांच पोलिंग बूथों पर गया। हर जगह ऐसे दर्जनों लोग मिले, जिनके पास वोटर आई कार्ड तो मौजूद था और पिछले चुनावों में वोट भी डाल चुके थे, लेकिन इस बार नाम लिस्ट से गायब था।

ऐसे में ये सवाल उठता है कि चुनाव आयोग ने वोटर आईकार्ड अनिवार्य करना चाहता है लेकिन वोटर आईकार्ड मौजूद होने के बाद भी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब क्यों हैं जबकि उन लोगों का नाम मौजूद हैं, जो ना तो भारत के नागरिक हैं और ना ही उनका कोई स्थायी पता है। खैर, सबसे जरुरी सवाल कि असली पप्पू कौन? वोट देने के इरादे से घर से निकला और करीब चार घंटे तक धक्के खाकर लौटने वाला वोटर या फिर ऐसी व्यवस्था देनेवाला सिस्टम? (साभार-देशकाल डॉट कॉम)

रविवार, 26 अप्रैल 2009

राज ठाकरे के स‌मर्थन में...

कुछ दिन पहले मुझे एक ईमेल प्राप्त हुआ। यह ईमेल मेरे एक अजीज दोस्त ने भेजा था। फारवर्डेड मेल था लिहाजा यह नहीं पता चल पाया कि इसका जनक कौन है। लेकिन यह जरूर बताना चाहूंगा कि जिस दोस्त ने मुझे यह मेल भेजा वह मराठी है। मेल अंग्रेजी में था। मेरा ब्लॉग हिंदी में है। इसलिए मैंने पूरे मेल को हिंदी में हूबहू ट्रांसलेट करने की कोशिश की है। ईमेल इस प्रकार है....अगर आप राज ठाकरे के स‌मर्थक हैं तो कृपया निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें...

1. अगर आपका बच्चा मेहनत के बावजूद क्लास में फर्स्ट नहीं आ पाता तो उसे स‌िखाइये कि ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं। बल्कि जो बच्चा पढ़ने में तुमसे तेज है उसे पीटो और क्लास स‌े बाहर कर दो। तुम अपने आप फर्स्ट हो जाओगे।

2. स‌ंस‌द स‌िर्फ दिल्लीवालों के लिए है क्योंकि वह दिल्ली में स्थित है।
3. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्र स‌रकार के दूसरे स‌भी नेता दिल्ली के होने चाहिए।
4. मुंबई में हिंदी फिल्में नहीं स‌िर्फ मराठी फिल्में बनाई जानी चाहिए।
5. राज्य की बसों, ट्रेनों और फ्लाइट्स पर सिर्फ लोकल लोगों की भर्ती होनी चाहिए और दूसरे राज्यों की बसों, ट्रेनें और फ्लाइट्स महाराष्ट्र आने पर रोक लगा दी जानी चाहिए।
6. विदेशों में और भारत के दूसरे राज्यों में काम करने वाले मराठियों को वापस बुला लेना चाहिए, ताकि वो लोकल रोजगार पर कब्जा जमा स‌कें और बाहरी लोगों को खदेड़ स‌कें।
7. महाराष्ट्र में शंकर, गणेश और पार्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये देवता उत्तर (हिमालय) के हैं।
8. ताजमहल देखने पर रोक होनी चाहिए क्योंकि वह स‌िर्फ उत्तर-प्रदेश वालों के लिए है।
9. महाराष्ट्र के किसानों को केंद्र स‌े मिलने वाली मदद नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह पैसा पूरे देश स‌े टैक्स के रूप में इकट्ठा किया जाता है। इसलिए कोई मराठी इस पैसे को हाथ कैसे लगा स‌कता है?
10. हमें कश्मीर में आतंकवादियों का समर्थन करना चाहिए क्योंकि वह अपने 'राज्य की आजादी' के नाम पर बेकसूरों को मार रहे हैं। यह स‌ब वो अपने राज्य की आजादी के लिए कर रहे हैं।
11. महाराष्ट्र स‌े स‌भी मल्टीनेशनल कंपनियों को निकाल फेंकना चाहिए। भला वो हमारे राज्य में मुनाफा क्यों कमायें? हमें अपनी लोकल माइक्रोसाफ्ट शुरू करनी चाहिए। महाराष्ट्र पेप्सी और महाराष्ट्र मारुति जैसे प्रोडक्ट लांच करने चाहिए।
12. विदेश में या दूस‌रे राज्यों में बनाए गए स‌ेलफोन, दूसरे राज्य या देश की कंपनी की ईमेल स‌र्विस, टीवी आदि नहीं इस्तेमाल करने चाहिए। विदेशी फिल्में और विदेशी नाटक भी नहीं देखने चाहिए।
13. हमें भूखों मरना कबूल है। दस गुना महंगा स‌ामान खरीदना मंजूर है। लेकिन विदेशी चीजें खरीदना, दूसरे राज्यों की कंपनियों का स‌ामान खरीदना और आयात करना कबूल नहीं।
14. महाराष्ट्र में किसी भी दूस‌रे राज्य के व्यक्ति को उद्योग स्थापित करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए।
15. मराठियों को स‌िर्फ लोकल ट्रेनों का उपयोग करना चाहिए। गाड़ियों को मराठी नहीं बनाते और रेलमंत्री भी बिहारी है। इसलिए इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
16. स‌भी मराठी यह स‌ुनिश्चित करें कि उनके बच्चे महाराष्ट्र में ही जन्म लें, वहीं पढ़ें-लिखें और वहीं बूढ़े होकर मृत्यु को प्राप्त हों। तभी वह एक स‌च्चे मराठी कहलाएंगे।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

कोफ्त

यह पोस्ट मुझे भेजी है मेरे दोस्त राजेश निरंजन ने। राजेश को मैं कई बरस से जानता हूं। वह सामाजिक मसलों को लेकर काफी संवेदनशील हैं। पेशे से पत्रकार हैं। लिहाजा व्यवस्थागत खामियों और तेजी से हो रहे समाजिक पतन को लेकर अक्सर उनकी कोफ्त सामने आ ही जाती है। एक पत्रकार होने के नाते ऐसा होना लाजिमी भी है। यहां ज्यादा महत्वपूर्ण वह दृश्य है जिसे राजेश निरंजन सबके सामने रखना चाहते हैं। आप भी पढ़ें और अपनी राय दें।

दोपहर के करीब 12 बजे का वक्त था। मैं दिल्ली मयूर विहार फेज-1 की लालबत्ती से गुजर रहा था। तभी मेरी नजर फुटपाथ पर खड़ी एक अर्धनग्न सांवली सलोनी युवती पर पड़ी। वह कुर्ते से अपने तन को ढकने की कोशिश कर रही थी। चेहरे पर बेबसी का आलम था। आसपास से गुजर रही थीं गाड़ियां और कानों से टकरा रही थीं कुछ हल्की-फुल्की टिप्पणियां।
वह दृश्य देख मैं कुछ विचलित-सा हुआ। मन में एकबारगी सोचा क्यों न इसे एक सलवार लाकर दे दूं। फिर दूसरा विचार उठा। चलो छोड़ो आफिस के लिए पहले ही लेट हो चुके हैं और फिर सलवार खरीदने पर पैसे खर्च होंगे सो अलग। फिर मोटरसाइकिल को अंदर की तरफ मोड़ दिया। लेकिन नजरों के सामने बार-बार उसी युवती का चेहरा घूमने लगा। तभी बाजार के सामने मोड़ पर मुझे कुछ बैनर गिरे हुए दिखे। मन में कुछ सोचा... कुछ ठिठका.. सोचा समाज क्या कहेगा, फिर मन की उलझन व शर्म को एक तरफ रख मोटरसाइकिल रोकी... मोटरसाइकिल से उतरा... इधर-उधर देखा फिर बैनर उठा कर चुपचाप मोटरसाइकिल उठाई और वापस नोएडा-अक्षरधाम रोड़ की तरफ मुड़ गया। उस युवती के पास पहुंचा तो देखा... वह फुटपाथ पर बैठकर कंकड़-पत्थर उठा- उठाकर सड़क पर फेंक रही है... मैंने चुपचाप कपड़े के बैनर उस युवती के पास फेंके और वापस मोटरसाइकिल घुमाई... देखा युवती ने बैनर उठाकर अपने सिर के ऊपर चुन्नी की तरह रखा हुआ था और सड़क को छोड़ अपने ऊपर कक्कड़-पत्थर डाल रही थी। मन में उसकी स्थिति को लेकर एक टीस लिए मैं अपने आफिस की तरफ बढ़ गया... फिर भी मन था बार-बार उसकी दुर्दशा की तरफ जा रहा था.. मन में बार-बार ये विचार उठ रहे थे... क्या मैंने उसकी आधी-अधूरी मदद करके ठीक किया।
आज तो वह जैसे-तैसे अपना तन ढक रही है... कल क्या होगा, जब ये कपड़े भी नहीं रहेंगे... क्या उन जैसे लोगों को कपड़े देने या साफ कहें तो कपड़े का बैनर पकड़ा देना समस्या का हल होगा... नहीं! क्या ऐसे लोगों के लिए स्थायी निवास, सुरक्षा व इलाज की जरूरत नहीं है... क्या आज हम लोग इतने स्वार्थी हो गए हैं कि ऐसे लोगों की मदद के लिए कुछ भी नहीं कर सकते.... क्या आज मुझमें और एक जानवर में कोई अंतर नहीं रह गया? जो केवल अपने बारे में ही सोचता है... । ऐसे ढेर सारे प्रश्न लेकर मैं अपने आफिस पहुंच गया। थोड़ी देर में ही काम में इतना व्यस्त हो गया कि सब कुछ भूल बैठा.. आज खुद मैं और वह सब लोग मुझे संवदेनहीन नजर आए जो उस युवती की दुर्दशा देख उसे भगवान भरोसे छोड़ आगे बढ़ गए। क्या यही समाज रह गया है हमारा...मुझे कोफ्त हो रही है इस समाज पर अपने आप पर।
-राजेश निरंजन

शुक्रवार, 2 मई 2008

जहां पर्दे की जरूरत है, वहां पर्दा होना चाहिए : कुंवर 'बेचैन'

मंच के स‌ाथ हिंदी कविता की दूरी यद्यपि छायावाद के जमाने स‌े ही बढ़ने लगी थी लेकिन अभी बमुश्किल तीस वर्ष पहले तक मंचीय कविता को आज की तरह कविता की कोई भिन्न श्रेणी नहीं माना जाता था। आज भी शास्त्रीय रुचियों वाले कुछ कवि मंच पर प्रतिष्ठित हैं, लेकिन एक जाति एक जेनर के रूप में मंचीय कविता अब शास्त्रीय रुचि वाले लोगों के बीच कुजात घोषित हो चुकी है। इस विडंबना को लेकर और कुछ अन्य महत्वपूर्ण स‌वालों पर भी प्रस्तुत है मंचीय कविता के प्रतिष्ठित नाम शायर कुंवर 'बेचैन' के स‌ाथ कुछ अरसा पहले हुई रवीन्द्र रंजन की खास बातचीत के प्रमुख अंश-

कवि-सम्मेलनों और मुशायरों का जो स्तर पहले देखने को मिलता था वह इधर दिखाई नहीं दे रहा है। क्या आप को भी ऎसा लगता है कि मंचीय कविता का स्तर गिर रहा है?
-हां, यह स‌च है कि आज जो कविता मंच पर पढ़ी जा रही है, कलात्मक दृष्टि स‌े उसका स्तर गिरा है। थोड़ा फूहड़पन भी आया है। कहा जाता है कि यह फूहड़पन हास्य कविता के जरिये ही आया है। हालांकि मैं इसे पूरी तौर पर स‌च नहीं मानता। मेरा मानना है कि रस कोई भी फूहड़ नहीं होता। उस रस में स‌ुनाई जाने वाली कविता फूहड़ हो स‌कती है। लेकिन मंच पर अगर कुछ घटिया हो रहा है तो काफी कुछ अच्छा भी हो रहा है। दरअसल, हो यह रहा है कि जो लोग कभी कवि स‌म्मेलनों में नहीं जाते वे ही कवि स‌म्मेलनों की आलोचना कर रहे हैं। पूरी रचना स‌ुने या पढ़े बगैर मात्र मीडिया स‌े प्रसारित कुछ अंश स‌ुनकर या पढ़कर ने निष्कर्ष निकाल रहे हैं। आज भी ऎसे कवि हैं जो मंच के माध्यम स‌े एक बहुत बड़े वर्ग तक पहुंचकर विद्वेष मिटाने का काम कर रहे हैं। इसलिये आलोचकों को एकांगी नहीं होना चाहिये।

लेकिन यह तो एक आम बात है कि मंचों पर अब हल्के-फुल्के कवियों को ही ज्यादा कामयाबी मिल रही है। श्रोताओं की रुचि में इतना परिवर्तन आने की क्या वजह हो स‌कती है?
-जहां तक श्रोता का टेस्ट बदलने का स‌वाल है तो मैं कहूंगा कि आज का जो स‌माज है वह तीन चीजें लिये बैठा है-तनाव, आक्रोश और तेजी। गरीब स‌े मिलकर अमीर, अनपढ़ स‌े लेकर पढ़ा-लिखा तक, हर व्यक्ति आज किस‌ी न किसी तनाव में जी रहा है। ऎसे में हास्य की अच्छी कविता हो या खराब या फिर चुटकुले ही क्यों न हों, उनके माध्यम स‌े व्यक्ति तनाव स‌े निकलना चाहता है। जैसे तनाव मुक्त करने वाली गोलियां-गोली कौन स‌ी है इससे किसी को खास मतलब नहीं होता। उसे तनाव स‌े मुक्ति मिल गई। वह कविता कैसी थी, तनाव मुक्त करने वाली गोली कौन स‌ी थी इससे उसे कोई मतलब नहीं रहता। यह बात अलग रही कि घर जाने के बाद या कुछ दिनों बाद वह स‌ोचे कि वह तो चुटकुला ही था।
दूसरी चीज है आक्रोश। आज हर आदमी एक आक्रोश लिये बैठा है। जब मंच स‌े उसके आक्रोश की अभिव्यक्ति किसी कवि द्वारा व्यक्त होती है तो श्रोता को अच्छा लगता है। उस‌का स्तर क्या है यह बात उसके लिये बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती। तीसरी चीज है तेजी अर्थात् गति। हर आदमी आज जल्दी में है। हमारे यहां कविता प्रतीकात्मक शैली में कहने का चलन रहा है। किंतु आज यदि हम ऎस‌ा करते हैं तो हो स‌कता है कि कविता श्रोता की स‌मझ में ही न आए। आज कविता का अर्थ श्रोता तक तपाक स‌े पहुंचना चाहिये। यह तभी स‌ंभव है जब स‌ीधी-सीधी बात कही जाए। स‌िर्फ अर्थ ही नहीं, स‌ुनाने में भी गति चाहिये। क्योंकि आजकल हर व्यक्ति गाड़ी में ही दौड़ना चाहता है। जहां तक स्तर की बात है तो आज बहुत स‌े मंचीय कवियों को स्तर की स‌मझ नहीं है और न ही यह स‌मझ श्रोताओं के पास है। हालांकि आज भी बहुत स‌े कवि हैं जिन्होंने मंच पर भी स्तर कायम रखा है।

हिंदी कविता में गजल की स्थिति को लेकर आलोचकों में अभी भी मतभेद हैं। इसके बारे में आपकी क्या राय है?
-शुरू में उर्दू शायरों का भी कहना था कि हिंदी गजलकार गजल के मिज़ाज को जानते ही नहीं और अंट-शंट गजल कह रहे हैं। कुछ हद तक यह स‌च भी था। क्योंकि जब एक भाषा की विधा किसी दूसरी भाषा में प्रवेश करती है तो उसे एडजस्ट होने में कुछ स‌मय तो लगता ही है। मेरा मानना है कि हिंदी गजल स‌बसे अधिक स‌मन्वयकारी है। यह स‌बसे अधिक करीब लाने वाली, सांस्कृतिक एकता स्थापित करने वाली स‌ाबित हुई है। आज उर्दू शायर भी अपने गजल स‌ंग्रह देवनागरी में लिपि में छपवा रहे हैं। दुष्यंत ने जिस हिंदी गजल की शुरुआत की वह आज काफी फल-फूल रही है। हिंदी गजल ने अपने छोटे-छोटे पैरों स‌े 30 स‌ाल की लंबी यात्रा तय कर ली है। इस दौरान हिंदी गजल ने बहुत स‌े नए विषय दिये हैं, जिन्हें उर्दू वालों ने भी अपनाया। इसलिए हिंदी गजल का उदय हिंदी कविता और उर्दू कविता दोनों के ही लिये स‌ुखद माना जा स‌कता है।

हिंदी गजल के इस स‌मन्वयकारी प्रभाव के बारे में थोड़ा और विस्तार से बताएं।
-वैसे तो स‌ारी विधाएं युग के अनुसार अपने स्वरूप में बदलाव लाती हैं। दोहों को भी नई भाषा, शिल्प, नए प्रतीकों के माध्यम स‌े कहने का रिवाज चला है। उर्दु गजल ने भी अपने परंपरागत विषय हुस्न-इश्क को छोड़कर नए विषय अपनाए हैं। आधुनिक परिस्थितियों में व्यंग्यात्मक कविता भी बड़ी तेजी स‌े उभरी है। ये प्रवृत्तियां उर्दू गजल में बहुत कम थीं, लेकिन जब स‌े हिंदी कविता में दुष्यंत की गजलें स‌ामने आईं तब स‌े ये बदलाव देखने को मिले हैं। इमरजेंसी पीरियड में दुष्यंत ने जो गजलें कहीं उनसे व्यवस्था पर भारी चोट हुई। उनमें एक नयापन था जो उर्दू गजलों में कभी नहीं रहा। हिंदी के कवि भी इससे बहुत प्रभावित हुए। गीतकार, नवगीतकार भी हिंदी गजल की ओर उन्मुख हो गए।
इस स‌मय यदि हिंदी कविताओं के स‌ंकलन उठाए जाएं तो उनमें 70 फीसदी स‌ंकलन गजलों के हैं। चाहे वे व्यक्तिगत स‌ंकलन हों या अलग-अलग कवियों के। हम कह स‌कते हैं कि हिंदी गजल आज तुकांत और लयबद्ध हिंदी कविता का पर्याय बन गई है। विधा कोई भी हो यदि वह लगातार एक स‌ी बनी रहती है तो उसमें जड़ता आ ही जाती है। हिंदी कविता में गजल के प्रवेश ने उसकी इस जड़ता पर चोट की है। अज्ञेय जी जापान स‌े हाइकू कविता लाए। त्रिलोचन जी ने स‌ॉनेट लिखे। आज के उर्दू शायर दोहे लिख रहे हैं। हिंदी गजलों को इसी तरह की प्रयोगात्मक श्रेणी में लिया जाना चाहिए। यद्यपि उसका विस्तार आज अन्य किसी भी प्रयोग स‌े ज्यादा हो गया है।

आपकी दृष्टि में वर्तमान उर्दू गजल किन परिवर्तनों स‌े गुजर रही है? उसमें कौन स‌े बुनियादी बदलाव आते दिखाई दे रहे हैं?
-आज उर्दू गजल के विषय भी वही हो गए हैं स‌मकालीन हिंदी कविता के हैं। शायरी के परंपरागत विषयों को बरकरार रखते हुए भी शायरों ने आज की स‌ोच, स्थिति, विद्रूपताओं को स‌ाफ-साफ कहना शुरू कर दिया है। जबकि शायरी में अपनी बात इशारों में कहने का चलन ज्यादा रहा है। हालांकि उर्दू शायरी मुख्य विषय आज भी मोहब्बत ही है। लेकिन आज शायर मोहब्बत पर भी जो कुछ कह रहे हैं, उसकी भाषा और विषय में स‌मयानुसार स्पष्ट बदलाव देखा जा स‌कता है। बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, निदा फाजली आदि की उर्दू भी हिंदी जैसी हो गई है। भाषा, बिंब, प्रतीक स‌भी में तेजी स‌े परिवर्तन आया है। अब उर्दू के शायर भी मां, पिता, बहन, बेटी पर, नेताओं पर शेर कह रहे हैं। दूसरी तरफ रुबाइयों को उर्दू का कठिन छंद माना जाता है, लेकिन हिंदी में आज रुबाइयां लिखने का प्रचलन उर्दू स‌े ज्यादा हो गया है। जहां तक खामियों का स‌वाल है, शायर का स‌ीधा स‌ंबंध जब जनता स‌े बनता है तो शास्त्रीयता वाला पक्ष कुछ कमजोर हो ही जाता है।

स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में नई कविता का दावा था कि आधुनिक विसंगतियों स‌े भरे यथार्थ को वह ही स‌ामने लाने में स‌क्षम है। उसके कवियों ने नवगीत की जबर्दस्त आलोचना भी की। लेकिन आज नवगीत के कुछ आलोचक भी नवगीत लिख रहे हैं, इसकी वजह क्या है?
-समालोचकों का कहना है कि नवगीत नई कविता के स‌ामने आ खड़ा हुआ था। मेरा मानना है कि गीत एक स‌हज प्रक्रिया है। जैसे-जैसे व्यक्ति का परिवेश बदलता है, उसकी मानसिकता भी बदलती है। जैसे कस्बाई माहौल में आपसी प्रेम-भावना ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। जबकि महानगर की स्थिति है...नयन गेह स‌े निकले आंसू ऎसे डरे-डरे, भीड़ भरा चौराहा जैसे कोई पार करे...। मतलब यह की नवगीत की परंपरा स‌हज रूप में ही विकसित हुई। यह कहना कि कोई चीज स‌ामने लाकर खड़ी कर दी गई, शायद उचित नहीं है। स‌मय के अनुसार नए परिवर्तन आए तो कवियों ने उसे गीत में ढाला और एक स‌हज प्रक्रिया के तहत नवगीतों की परंपरा शुरू हुई। प्रारंभिक नवगीतकार जैसे राजेंद्र प्रसाद स‌िंह, शंभूनाथ स‌िंह, उमाकांत मालवीय, ओमप्रकाश आदि नवगीत में स‌हज रूप स‌े ही आए। इन्हें नवगीत तो स्थापित करने का भी श्रेय जाता है।

गीत व नवगीत का भेद कहां तक उचित है? पुराने गीतकार तो नवगीत जैसे किसी शब्द को मान्यता देने को भी तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि गीत तो गीत होता है, फिर यह नवगीत क्या है?
-हां, कुछ लोग ऎसा कहते हैं। उनका कहना है कि इसका नाम नवगीत नहीं होना चाहिये। मैं भी इस बात का पक्षधर हूं क्योंकि गीत तो गीत होता है, लेकिन किसी बात को खास पहचान देने के लिए एक विशेषण लगाना होता है। जो पुराने गीत चले आ रहे थे, उनसे ये कुछ हटकर हैं। इनकी भाषा, शिल्प, तेवर कुछ अलग है। कुल मिलाकर इस‌मे कुछ नयापन स‌ा दिखा, इसलिए इसको नवगीत कह दिया गया। जहां तक नई कविता का प्रश्न है, उम्र के स‌ाथ-साथ इसके विचार तत्व में वृद्ध हुई है। यह स्वाभाविक है। उम्र के स‌ाथ-साथ विचार बढ़ते ही हैं।

पिछले करीब तीन दशक स‌े स‌े आप अध्यापन स‌े जुड़े हैं आजकल जो छात्र हिंदी अध्ययन-अध्यापन में आ रहे हैं, वे हिंदी स‌ाहित्य में कितनी रुचि ले रहे हैं? हिंदी स‌ाहित्य के प्रति उनका क्या नजरिया है?
-सच्ची बात कही जाए तो आजकल हिंदी में बचा-खुचा माल आता है। जिस महाविद्यालय में मैं पढ़ाता हूं वहां बहुत स‌ारे विषय हैं। छात्रों के पास ऑप्शन हैं। जब कहीं एडमिशन नहीं होता तभी वे हिंदी में आते हैं। घर में पड़े-पड़े क्या करेंगे, इसी बहाने घर स‌े बाहर निकलने को तो मिलेगा। क्लास जाएं या न जाएं क्या फर्क पड़ता है। आजकल कोई ही छात्र होगा जो हिंदी में रुचि के कारण आता हो, पहले ऎसी स्थिति नहीं थी। कविता या स‌ाहित्य स‌े लगाव के कारण आज कोई हिंदी में नहीं आ रहा है। यह वास्तविकता है। इसका प्रमुख कारण पब्लिक स्कूलों की संस्कृति है। हालत तो ये है कि ये बच्चे 'पैंसठ' तक नहीं जानते। इन्हें तो 'स‌िक्सटी फाइव' ही मालूम है। हालांकि इन स‌बके बीच अगर कोई अच्छा छात्र आ जाता है तो वह आगे जाकर अपनी प्रतिभा स‌िद्ध करता है। लेकिन फिलहाल ऎसी प्रतिभाएं कम ही आ रही हैं।

फिल्मों के लिए लिखने के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या फिल्मों के लिये लिखते हुए भी स्तर बरकरार रखा जा स‌कता है?
-जहां तक फिल्मों के लिये लिखने का स‌वाल है तो वहां कहानी की मांग के अनुसार ही गीतकार को शब्द पिरोने होते हैं। अब अगर कहानी की मांग घोर श्रृंगारिक है तो यहां गीतकार को स‌ावधानी बरतनी पड़ती है। इस मामले में गुलजार और निदा फाजली की प्रशंस‌ा करनी होगी, जिन्होंने अपना स्तर बनाए रखा है। गुलजार की शायरी में नयापन है। निदा फाजली भी बहुत उम्दा शायर हैं। उनकी शायरी की जो नवैय्यत है उसी के लोग कायल हैं। दबाव में अगर कहीं थोड़ी बहुत नंगेपन की भी स‌ंभावना होती है तो अच्छा शायर उसमें पर्दा डाल देता है, जिससे उसमें फूहड़ता नहीं आने पाती। जहां पर्दे की जरूरत है वहां पर्दा रहना चाहिए। शायरी में अगर थोड़ा-बहुत पर्दा रहे तो यह अच्छी बात है।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2007

भगदड़ के रणबांकुरों के नाम

नारद में और भगदड़ डॉट ब्लाग पर मेरी रचना आपरेशन सुंदरी-लाइव फ्रॉम झंडूपुरा के संबंध में टिप्पणी पढ़कर सचमुच मुझे बेहद अफसोस हुआ। खैर इससे टीम की मानसिकता का पता तो चल ही गया। टीम में शामिल लोग यह मानकर चलते हैं कि पूरी दुनिया में दो लोग एक जैसा नहीं सोच सकते। भाषा भी ऐसी है कि जैसे मैं कोई जबरदस्ती का लेखक हूं और मुझे नेट पर झूठा नाम कमाने का बहुत शौक है। लिहाजा मैंने किसी दूसरे का आयडिया कॉपी करने कहानी लिख डाली और मैं इतना बेवकूफ हूं कि उसे अपने नाम से अपने ब्लाग पर डाल भी दिया। और उनकी नजर इतनी पैनी है कि उन्होंने मुझ रचना चोर को रंगे हाथ धर-दबोचा। अपनी पीठ भी ठोंक डाली। लो भइया देखो हमने कितना बड़ा तीर मार लिया। एक कहानी चोर को पकड़ लिया। वैसे जिसे ये लोग कहानी समझ रहे हैं वह कहानी नहीं यथार्थ है। और यथार्थ से कोई भी परिचित हो सकता है। पहले मैं सोच रहा था कि भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। फिर मैंने सोचा कि कुछ तो कहना ही पड़ेगा नहीं तो लोग सोचेंगे कि भगदड़ वाले सही कह रहे हैं। मैं साहित्यजगत का कोई प्रोफेशनल चोर हूं।
खैर, ईमानदारी से मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि मैंने आज से पहले बुनो कहानी वाली वह रचना नहीं पढ़ी थी। अच्छा हुआ कि आपने उसका लिंक दे दिया। मैंने उसे पढ़ा। आपका शुक्रिया। मेरी रचना को पढ़कर हर उस व्यक्ति को ऐसा लग सकता है कि मेरा आयडिया मौलिक नहीं है। लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि यह महज एक संयोग है। इसलिये भी कि यह मेरी लिये कोई कहानी नहीं है। मैं खुद एक खबरिया चैनल में हूं इसलिये इस तरह की बातें, इस तरह की चर्चा किसी भी चैनल में आम है। हम जिस माहौल में रहते हैं जिस वातावरण में काम करते हैं हमारा लेखन भी उसी से प्रभावित होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि चैनल की नौकरी ऐसी होती है कि आपको पढने का ज्यादा वक्त ही नहीं मिलता। और पढ़ने के बाद कोई मूर्ख ही उसी बात को दोबारा लिखना पसंद करेगा। मैं फिर आपकी गलतफहमी दूर करने के लिये कहना चाहूंगा कि यह मेरी लिये कहानी नहीं है। यह चैनल के लिये बहुत सामान्य सी बात है। इसलिये मैं इसे व्यंग्यात्मक शैली में बड़ी आसानी से लिखता गया। न ही मुझे कोई कहानी बुननी पड़ी और न ही कोई कल्पना करनी पड़ी। मै कोई सफाई पेश नहीं करना चाहता लेकिन मुझे इस बात का बेहद अफसोस है कि भगदड़ टीम ने बिना मेरा पक्ष सुने मुझ पर बेहद घटिया आरोप लगा दिया। अंत में मैं सिर्फ एक बात कहना चाहूंगा कि मैं जबरदस्ती नहीं लिखता। कोई चीज जब लिखने को मजबूर कर देती है तभी मैं लिखता हूं। इसलिये कहानी बुनना या फिर किसी के आयडिये को कापी करना मैं बेहद शर्मनाक मानता हूं। और क्या कहूं मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन भगदड़ टीम के इस आरोप ने मुझे सचमुच काफी दुख पहुंचाया है। बस नेट पर मौजूद लोगों से एक ही अनुरोध है कि बिना जाने-समझे किसी पर कोई आरोप न लगायें। इंटरनेट एक अथाह सागर की तरह है। यह जरूरी नहीं कि हर किसी ने हरेक सामग्री का अध्ययन किया हो। अब औऱ क्या कहूं...शब्द नहीं मिल रहे हैं। बस यही सोच रहा हूं कि आपके इस आरोप की वजह से मेरे बाकी मित्र मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2007

मुझे इन कांवड़ियों से बचाओ

दफ्तर के लिये लेट हो रहा था। आज मीटिंग थी। वक्त पर पहुंच जाऊं यह सोचकर मैंने अपनी गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल्द ही ब्रेक लगाना पडा़। अब गाड़ी बमुश्किल चालीस की रफ्तार से बढ़ रही थी वह भी रुक-रुक कर। इस कछुआ चाल की वजह यह थी कि मेन रोड के तकरीबन आधे हिस्सों को बैरीकेड लगाकर रिजर्व कर दिया गया था। जानते हैं किसके लिये? शिवभक्त कांवड़ियों के लिये। कांवड़ लेकर नंगे पांव सड़क नापने वाले भक्त (?) सफलता पू्र्वक अपनी मंजिल पर पहुंचें इसके लिये प्रशासन ने पूरे इंतजाम कर रखे हैं। जगह-जगह पुलिस भी तैनात रहती है। शिवभक्तों को पूरी तरह वीआईपी ट्रीटमेट मिलता है। क्या मजाल कि कांवड़ियों को कोई कष्ट हो जाये। सड़क पर तो वो यूं चलते हैं जैसे पूरी सड़क उनके बाप की है। आम लोगों के प्रति उनका रवैया ऐसा होता है जैसे कांवड़ ले जाकर वो खुद पर नहीं बल्कि देशवासियों पर कोई बहुत बड़ा ऐहसान कर रहे हों।

हम थोड़ी ही दूर बढ़े थे कि एक कांवड़िये ने हाथ देकर हमसे इतने अधिकार पूर्वक लिफ्ट मांगी जैसे यह उसका जन्मजात हक हो और उन्हें हम हर हालत में लिफ्ट देने को बाध्य हों। हालांकि हमने उसके इस अधिकार को चुनौती देते हुये अपनी गाड़ी और तेजी से आगे बढ़ा दी। उसने हमें खा जाने वाली नजरों से देखा और कुछ (जाहिर है अच्छा नहीं) बड़बड़ाते हुये पीछे से आ रही एक दूसरी गाड़ी पर अपनी नजर गड़ा दी।

क्या आप जानते हैं कि जब कांवड़ ले जाने का मौसम आता है तो शहर में आये दिन होने वाले छोटे-मोटे अपराध कम हो जाते हैं? इसलिये नहीं कि सारे चोर-बदमाश बड़े ही धार्मिक हो जाते हैं, बल्कि इसलिये क्योंकि ऐसे समय में वो लोग कांवड़िये बन जाते हैं। ऐसा हम नहीं हमारे एक दोस्त कहते हैं। उनकी ऐसी बातें सुनकर कई बार तो हम भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। आज तो खाना खाते वक्त हमने उनसे पूछ ही लिया एस जी जरा बताइये तो अपराध कम होने के इस अध्ययन के पीछे आपकी थ्योरी क्या है? यह सवाल करते ही उन्होंने हमें यूं देखा जैसे हमने कोई मूर्खों वाली बात कह दी हो, फिर समझाया अरे, इतना भी नहीं समझते आप? ये बदमाश और चोर उचक्के ही तो हैं जो आजकल के मौसम में गेरुये वस्त्र धारण कर कांवड़िये बन जाते हैं। क्या......? हमारी भावनाओं (धार्मिक)को झिंझोड़ दिया था उन्होंने। खैर, कुछ देर बाद हम नार्मल हो गये। काफी दिमाग लगाकर हमने उनकी इस थ्योरी को गलत साबित करने के लिये एक सवाल उठाया...लेकिन दोस्त कांवड़ ले जाना तो बड़े ही कष्ट का काम है? चोर-उचक्के भला जानबूझकर कष्ट क्यों सहेंगे?

एस जी ने फिर आंखें तरेरीं।...अरे भई, जब कदम-कदम पर बढ़िया खाना-पीना और आवभगत होगी तो खाली और बेकार घूमने वालों के लिये ऐश का इससे सुनहरा मौका और कहां मिलेगा? उन्होंने याद दिलाते हुये कहा- जहां तक बदमाशों के कांवड़िये बनने की बात है तो देखा नहीं आपने गुड़गांव के मानेसर में क्या अभी हुआ? क्या सरेआम तोड़फोड़ और आगजनी करने वाले आपको किसी भी नजरिये से शिवभक्त नजर आ रहे थे?

उनकी बात अब हमारे पल्ले पड़ने लगी थी। कल तक तो हमने भी यही सुना था कि कांवड़ ले जाने वाले शिवभक्त बेहद शालीन और सीधे-साधे लोग होते हैं। लेकिन तकरीबन दस रोज से कांवड़यों की वजह से हमें (बल्कि हर आने-जाने वाले को) जो परेशानी उठानी पड़ रही है उसे खुद ही समझा जा सकता है। किसी से बयान नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसा करने पर अधर्मी, लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला जैसे न जाने कितने विश्लेषणों से हमें नवाजा जा सकता है। अगर बात फैल गई तो कांवड़ियों के कोप का शिकार भी होना पड़ सकता है।

इसलिये अपने मित्र की थ्योरी से हम कितने सहमत या असहमत हैं यह बहुत मायने नहीं रखता। कांवड़ियों से साबका होने का यह कोई पहला मौका नहीं है। हर साल ऐसा होता है। कभी-कभी तो पूरा रास्ता ही रोक दिया जाता है। पुलिस वाले बोलते हैं वापस जाओ, आज यहां से नहीं निकल सकते। (रास्ता भी खुश होता होगा कि कुछ दिन के लिये ही सही वह वीआईपी हो गया है) कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है। ऐसा करो आज छुट्टी ले लो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि कांवड़ियों की वजह से फौरन छुट्टी एप्रूव भी हो जाती है।

हो सकता है इसी वजह से ही सही, हमारे खाते में भी एक पुण्य कर्म करने का श्रेय जुड़ जाये। क्या पूछा? किस वजह से?....अरे अभी कल ही तो हमने दफ्तर आते वक्त एक कांवड़ये के लिये रास्ता छोड़ा था। ये अलग बात है कि वो हमारी इच्छा नहीं, बल्कि मजबूरी थी और मजबूरी क्या-क्या करा सकती है यह तो आप समझ ही सकते हैं। (दोस्तों मेरा इरादा किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का नहीं है, अगर किसी को ऐसा लगे तो छमा प्रार्थी हूं)

 
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