संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

अब कौन करेगा 'कागद कारे'

खामोश हो गई एक मुखर आवाज। हमेशा के लिए खामोश हो गए प्रभाष जोशी। हिंदी पत्रकारिता का एक युग खत्म हो गया। पत्रकारिता जगत में प्रभाष जोशी के मुरीद भी हैं और आलोचक भी। पैसे लेकर चुनावी खबरें छापने वाले अखबारों के खिलाफ अगर कोई सबसे पहले बोला तो वह प्रभाष जोशी ही थे। प्रभाष जोशी ने ऐसे अखबारों के खिलाफ बाकायदा अभियान ही छेड़ दिया था। उन्होंने चुनाव में बिकाऊ अखबारों की जमकर खबर लिखी। जनसत्ता में लगातार लेख लिखे। नतीजा यह हुआ कि पैसे लेकर खबरें छापने वाले अखबारों के खिलाफ पूरे देश में माहौल बनना शुरू हो गया।

जातीय दंभ के मुद्दे पर प्रभाष जोशी को आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा। अपने एक लेख में बड़बोलापन दिखाते हुए जोशी ने अलग-अलग क्षेत्र की कुछ हस्तियों के नाम गिनाए और यह दावा कर दिया कि वह इसलिए श्रेष्ठ हैं क्योंकि वह ब्राह्मण हैं। प्रभाष जोशी के इस लेख पर बवाल मच गया। समर्थकों को अचरज हुआ कि इतने बड़े पत्रकार के भीतर जातीयता को लेकर इतना दंभ कैसे हो सकता है? आलोचकों को भी यकीन नहीं हुआ कि प्रभाष जोशी ऐसा सोच सकते हैं।

प्रभाष जोशी ने जो कहा ताल ठोंककर कहा। यही उनकी पहचान भी बन गई। जनसत्ता में उन्होंने तकरीबन हर मुद्दे पर लिखा। संघ के खिलाफ उनकी वक्रदृष्टि। क्रिकेट के प्रति पागलपन। पत्रकारिता के प्रति लगाव और ईमानदारी। यही उनकी विरासत बन गई। वह प्रभाष जोशी ही थे जिन्होंने 1983 में जनसत्ता का संपादक पद संभालने के बाद इसे एक ऐसे अखबार की पहचान दिलाई जो बेखौफ होकर लिखता है। बेखौफ होकर अपनी बात कहता है। नतीजा यह हुआ कि प्रभाष और जनसत्ता एक दूसरे के पूरक बन गए। 1995 में जनसत्ता के संपादक पद से रिटायर होने के बाद वह बतौर सलाहकार इस अखबार से जुड़े रहे। सिर्फ जुड़े ही नहीं रहे। लगातार कागद भी कारे करते रहे।

प्रभाष जोशी की जगह को भर पाना नामुमकिन है। जनसत्ता में हर रविवार को छपने वाला उनका कॉलम 'कागद कारे' अब नहीं होगा। जनसत्ता के पहले पन्ने पर क्रिकेट जैसे विषय पर एक से बढ़कर एक रिपोर्ट और टिप्पणियां लिखने वाला भी अब कोई नहीं होगा। जनसत्ता अब भी है लेकिन अब प्रभाष जोशी नहीं हैं। इस सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा। उनके चाहने वालों को, उनके आलोचकों को और हम सबको।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

अब भी जलाए बैठे हैं उम्मीद का चिराग (मेरी रेल यात्रा-3)

ट्रेन में भीड़भाड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। अब तो मुझे उस खूबसूरत लड़की से ईर्ष्या होने लगी थी। वो इसलिए क्योंकि ट्रेन में इतनी भीड़-भाड़ होने के बावजूद उसे बर्थ में लेटने का सौभाग्य प्राप्त था। वैसे सोचता हूं कि मेरी यह ईर्ष्या इस बात की कम और इस बात की अधिक हो सकती है कि कहां तो वह मेरे बगल में बैठी थी और कहां उस बर्थ (या उसके चाचा !@$%^&*()_+) मुझे उससे दूर कर दिया। बुरा हो उस बर्थ का या फिर उसके...। सच कहूं तो मुझे गुस्सा आ रहा था उसके चाचा पर। महाशय अच्छे भले बर्थ पर सो रहे थे पता नहीं क्या सूझी कि नीचे तशरीफ ले आए और उस मोहतरमा को भेज दिया ऊपर। वैसे एक-दो बार मैंने बहाने से ऊपर देखा तो वह सोई नहीं थी, बल्कि लेटे हुए टुकुर-टुकुर ताक रही थी। यहां-वहां। इतनी भीड़ और शोरगुल में 'बेचारी' को नींद आ भी कैसे सकती थी? यह बात भला उसके चाचा को कौन समझाता? खैर, मुझे उससे बातचीत करना अच्छा लग रहा था। ऐसा स्वाभाविक भी है। लेकिन अब उससे बातचीत कर पाना मुमकिन नहीं था। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर मैं मन ही मन उसके चाचा को कोसे जा रहा था। (और कर भी क्या सकता था?)
हालांकि ईर्ष्या तो मुझे उन लोगों से भी होने लगी थी जो फर्श पर इधर-उधर लुढ़के हुए नींद का आनंद ले रहे थे। और मैं यह सोचकर बैठे-बैठे ही रात बिता रहा था कि मैं भला यहां कैसे सो सकता हूं? वैसे अगर मैं वहां सोना चाहता भी तो यह मुमकिन नहीं था। वहां पैर रखने तक की जगह नहीं थी। एक तो उसके चाचा और दूसरे बीडी़ के धुयें ने मुझे काफी परेशान कर रखा था। अब धुयें के अलावा डिब्बे के वातावरण में बदबू भी महसूस होने लगी थी, जिसका भभका थोड़ी-थोड़ी देर में उठकर परेशान कर देता था।
बैठे-बैठे कमर दुखने लगी थी। पैर सुन्न हो रहे थे। क्योंकि पैर पसारने की जरा भी गुंजाइश नहीं थी। अब मेरी 'एकमात्र खुशी' भी छिन जाने से मैं मन ही मन उस घड़ी को कोस रहा था जब मैं उस ट्रेन में चढ़ा था। तभी कोई छोटा स्टेशन आ गया। गाड़ी रुक गई। बाहर से चाय-चाय की आवाजें आने लगीं। वेंडर खाने-पीने की चीजें लिये डिब्बे में घुसने की कोशिश करने लगे। हालांकि उन्हें इस कोशिश में कामयाबी नहीं मिली। लिहाजा वे बाहर खिड़कियों से ही यात्रियों को लुभाने की कोशिश करने लगे। चाय बेचने वालों ने तो यात्रियों को लुभाने में सफलता भी पा ली थी। खाने की तली-भुनी चीजें लिये भी कुछ वेंडर मुसाफिरों की भूख मिटाने का दावा कर रहे थे। उनका यह दावा कितना सही था इस बात का पता तो उन बासी से लगने वाले खाद्य पदार्थों को खाकर ही लगाया जा सकता था। मैं अब भी असमंजस में था कि चाय पी लूं या नहीं। मेरे बगल वाले सज्जन तो अब तक चाय की चुस्कियों में मशगूल हो चुके थे। मैंने उनसे पूछा, भाई साहब ! कैसी है चाय? इस पर उन्होंने चाय का यूं बखान किया कि जैसे चाय नहीं अमृत पी रह हों। शायद उन्हें लग रहा था कि चाय पीकर वह उस डिब्बे में बेहद अहम हो गये हैं।
रात के एक बज चुके थे। मेरी मंजिल भी करीब आ रही थी। अब मेरा ध्यान डिब्बे के अंदर की गतिविधियों की बजाय बाहर की ओर टिक गया था। वह खूबसूरत लड़की अब भी जाग रही थी। मैंने आखिरी बार उसकी ओर देखा। फिर दूसरे यात्रियों पर एक सरसरी नजर डाली। लोग अब भी ऊंघ रहे थे। जिन्हें जगह नसीब थी वो नींद के आगोश में समाये हुये थे। जो सोने की सुविधा मे महरूम थे वो अब भी बीड़ी जलाकर नींद से लड़ने का प्रयास कर रहे थे। अपनी मंजिल आने की खुशी में मेरे अंदर स्फूर्ति का संचार होने लगा था। मैं अपना सूटकेस संभाल रहा था तभी गाड़ी के पहिये चिंचियाकर थम गये। मरी मंजिल आ चुकी थी। मैं जल्दी से गेट की तरफ लपका और नीचे स्टेशन पर उतर गया। वहां उतरने वाले काफी थे। शायद उस स्टेशन के बाद डिब्बे में पर्याप्त जगह हो चुकी थी। लेकिन वह जगह मेरे किस काम की। मैं रिक्शे पर सवार हुआ और नानी के घर की तरफ चल पड़ा। उस दिन से आज तक मेरी नजरें उस लड़की को तलाश रही हैं। हमने अब तक उम्मीद का चिराग जलाए रखा है। अभी तक बैठे हैं कुंवारे। यकीन है एक दिन वो हमें जरूर मिल जाएगी। आप भी दुआ कीजिएगा। मेरे लिये। (समाप्त)

सोमवार, 4 फ़रवरी 2008

कुछ न कुछ तो जरूर होना है (मेरी रेल यात्रा-2)

रात के दस बज चले थे। मैं अभी भी अपनी नींद पर काबू करने में कामयाब था। हां तो.., यह जिक्र करना सबसे जरूरी है उस सफर में मेरे बगल में एक खूबसूरत लड़की भी बैठी थी। रात करीब साढ़े दस बजे तक मैं भी नींद के आगे विवश होने लगा था। मुझे याद है कि एक-दो बार मेरा सिर उस खूबसूरत लड़की के कांधे पर टिक गया और हर बार चौंक कर मेरी नींद उड़ गई। बहरहाल, थोड़ी देर बाद ही मैंने उससे काफी कुछ परिचय बना लिया था। बात-बात पता चला कि वह इंदौर की रहने वाली है। उसने बड़े फक्र से बताया कि वह इंटर साइंस की छात्रा है। (तब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन-Ist year कर रहा था) थोड़ी देर में पता यह भी चल गया कि उसके साथ उसके चाचा भी हैं, जो ऊपर बर्थ पर सो रहे हैं। उसने मुझे अपनी वह खास अंगूठी भी दिखाई जिसमें छोटी सी घड़ी भी लगी थी। मैंने उसकी अंगूठी की तारीफ की। उसे अच्छा लगा। वैस तारीफ झूठी नहीं थी। अब शायद मैं उसकी भी तारीफ करता लेकिन इसकी शुरुआत से पहले ही उसके चाचा जी नीचे आ गये और उस खूबसूरत लड़की को ऊपर बर्थ पर सोने के लिये भेज दिया। खैर...।
अब तक रात के 11 बज चुके थे। सभी लोग नींद के आगोश में समाने लगे थे। सामान रखने वाली पतली सी बर्थ पर लेटे हुये लोग भी अब सो चुके थे। इस बीच कई छोटे-मोटे स्टेशन गुजर चुके थे। लेकिन भीड़ में कोई कमी नहीं आई थी। उल्टा उसमें बढ़ोत्तरी ही होती रही। जिनके लिए अपनी जरा सी जगह पर सो पाना मुश्किल था या जिनकी ओर उनके बगल वाला कई बार इसलिये आंखें तरेर चुका था कि वे नींद के आलम में उस पर कई बार गिर चुके थे। वे मजबूरी ने बीड़ी सुलगाकर नींद भगाने का प्रयास कर रहे थे। कुछ तंबाकू खा-खिलाकर टाइम पास कर रहे थे और नजरें बचाकर इधर-उधर थूक दे रहे थे। डिब्बे में ही। हालांकि यह उनकी विवशता थी क्योंकि खिड़की के 'नजदीक' होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त नहीं था।
बीड़ी का धुआं और तंबाकू ठोकने की भस डिब्बे में भर चुकी थी। वैसे शायद किसी को उससे असुविधा नहीं हो रही थी। मुझे इस पर आश्चर्य था। बेहद। लेकिन मुमकिन है कि वो इस वातावरण के अभ्यस्त रहे होंगे। पीने वालों को या न पीने वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रेलगाड़ी में धूम्रपान निषेध है। वैसे भी बुंदेलखंड की ट्रेनों में कोई नियम-कानून नहीं चलता। धूम्रपान निषेध तो बिल्कुल नहीं।
रात के 12 बजे होंगे। कहीं से डिब्बे में एक टीटी घुस आया। मुझे यह देखकर बेहद आश्चर्य हुआ कि वह टीटी किसी से टिकट नहीं मांग रहा था। कुछ लोग अपने आप ही टिकट निकालकर उसे दिखाने की कोशिश करते लेकिन वह बिना देखे ही उन्हें टिकट वापस रख लेने का इशारा करता और आगे बढ़ जाता। कुछ लोग उसे दस-बीस रुपये का नोट थमा रहे थे और वह चुपचाप उनकी 'भेंट' को स्वीकार कर आगे बढ़ता जा रहा था। बिना कुछ बोलो। बिना कोई प्रतिक्रिया किए। मुझे यह बात काफी परेशान कर रही थी, लेकिन बाकी लोगों को नहीं। शायद इसलिये कि वह इस बात के अभ्यस्त रहे होंगे। उनके लिये यह रोज की बात रही होगी। बाद में पता चला कि उन लोगों के पास टिकट नहीं था। पता यह भी चला कि इस ट्रेन में रोज ऐसा ही होता है। टिकट लेने की जरूरत नहीं, बस टीटी की जेब गर्म कर दो। सस्ते में निबट जाओगे। अपना भी फायदा। टीटी का भी फायदा। रेलवे जाए भाड़ में। वैसे भी रेल तो उन्हीं की संपत्ति है। बहरहाल, अब मुझे भी बार-बार झपकियां आने लगी थीं। (अगली कड़ी में जानिए मेरा उस खूबसूरत लड़की से ईर्ष्या का सबब)

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

सफर भी एक संघर्ष है भाई ! (मेरी रेल यात्रा-1)

बरस 1999.मौका था होली की छुट्टी का। शाम के पांच बजे थे। मैं इलाहाबाद के प्रयाग रेलवे स्टेशन पर बुंदेलखंड एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा था। ट्रेन शायद पांच मिनट बाद ही आ गई थी। छुट्टी में घर जाने का हर व्यक्ति के दिल में एक अलग ही उत्साह होता है। फिर मैं तो अपनी नानी के यहां जा रहा था। लिहाजा मैं कुछ ज्यादा ही खुश और उत्साहित था। हालांकि यात्रायें सब एक जैसी ही होती हैं। लेकिन यह मेरे लिये कुछ विशेष थी इसलिये कि इसमें मुझे कुछ अनुभव (वैसे बहुत खास भी नहीं हैं) ऐसे हुये जो यादगार बन पड़े। नानी के घर जाने का कार्यक्रम जल्दी में बना था। इसलिये मुझे बिन रिजर्वेशन के ही जाना पड़ा। जाहिर सी बात है इतनी जल्दबाजी में रिजर्वेशन तो मिलने से रहा।
खैर, ट्रेन आ गई और मैं उस पर सवार हो लिया। डिब्बे में दाखिल होने के लिये काफी कवायद करनी पड़ी। जनरल बोगी थी। यात्री ठुंसे हुये थे। ज्यादातर बुंदेलखंडी। हालांकि ननिहाल में मेरे बचपन का अच्छा-खासा वक्त गुजरा। इस लिहाज से मैं भी खुद को बुंदेलखंडी कह सकता हूं। लेकिन पिता जी की सरकारी नौकरी के कारण मैं ज्यादातर अलग-अलग शहरों में रहा। इसलिये मुझे उन यात्रियों की भाषा भी कुछ अटपटी सी लग रही थी। जिसे समझने के लिये दिमाग पर जोर देना पड़ता था। बहरहाल मेरा सफर शुरू हो चुका था। चूंकि सामान्य बोगी थी इसलिये सीट मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता था। यात्री, जिनमें ज्यादातर ग्रामीण थे, बोगी में अपने लिए जगह बनाने की कवायद में जुट गए थे। मैं अब भी संकोचवश ऐसे खड़ा था जैसे किसी गलत जगह आ गया हूं। मेरे हाथ में एक सूटकेस भी था, जिसे रखने की भी कहीं जगह नहीं थी। तभी एक व्यक्ति ने मेरी परेशानी भांप कर सामान इधर-उधर करवाकर मेरा सूटकेस रखवा दिया। मैंने मन ही मन उसका शुक्रिया अदा किया। एक व्याक्ति ने मुझे उसी सूटकेस में बैठने की सलाह दी। मैं बैठ गया। लेकिन आधा ध्यान इस ओर लगा था कि कहीं मेरा 'कीमती' सूटकेस टूट न जाये। भीड़ इतनी थी कि डिब्बे के गेट तक लोग ठुंसे हुये थे।
अब घड़ी शाम के छह बजा रही थी। लोग धीरे-धीरे अपने बैठने की जगह बना चुके थे। दोनों ओर की सीटों के बीच की खाली जगह ठसाठस भर चुकी थी। कुछ लोग जहां फर्श पर ही बैठकर संतुष्ट थे वहीं सीटों पर बैठे लोग खुद को किसी बादशाह से कम नहीं समझ रहे थे। वो इसलिये परेशान थे कि उन्हें पैर पसारने की जगह नहीं मिल रही थी। कुछ लड़के सामान रखने वाली पतली सी बर्थ पर लेटने की असफल कोशिश कर रहे थे। असफल इसलिये क्योंकि लेटने के बावजूद उनका सारा ध्यान इस ओर था कि कहीं गिर न जाएं और नीचे बैठे लोग पिच्चे हो जाएं।
अब तक मुझे सीट पर थोड़ी सी जगह मिल चुकी थी। लिहाजा मैं भी उन 'बादशाहों' की श्रेणी में आ गया था जिन्हें सीट पर बैठने का 'गौरव' या कहें सुख हासिल था। रात के नौ बजने को थे। लोगों ने बैठे-बैठे ऊंघना शुरू कर दिया था। कुछ लोग फर्श पर लुढ़के थे तो कुछ अपने बगल वालों के कंधे का सहारा लेकर नींद से लड़ रहे थे। सामान वाली पतली सी बर्थ पर लेटे हुये लोग अब भी टकटकी लगाकर ऊपर की बर्थ (जो वाकई सोने के लिए ही होती है) पर लेटे लोगों को हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे। नींद उन्हें अभी भी नहीं आ रही थी या शायद गिरने का डर उन्हें सोने नहीं दे रहा था। नींद के सामने लोग कैसे लाचार हो जाते हैं, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिल रहा था। (अगली कड़ी में जिक्र उस खूबसूरत लड़की का जो खुशकिस्मती से मेरी ही सीट पर और मेरे ही बगल में आसीन थी..)

सोमवार, 31 दिसंबर 2007

जो आने वाले हैं दिन उन्हें शुमार में रख...



देखते ही देखते एक साल और गुजर गया. अगर मुश्किल में गुजरें तो एक-एक पल गुजारना मुश्किल होता है. यहां तो 365 दिन गुजर गये. सोचकर अजीब लगता है. ये दिन, महीने, साल कैसे गुजर जाते हैं. इसी का नाम तो जिंदगी है. जिंदगी का कोई लम्हा बहुत ही खुशगवार बन जाता है. कोई लम्हा यादगार बन जाता है तो कोई कभी न भूलने वाला डरावना सपना भी. जो गुजर गया वो गुजर गया. जो याद रखने लायक नहीं है उसे भूल जाना ही ठीक है. खैर मैं तो उन बातो का जिक्र करना चाहूंगा जिन्हें मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा. पाना-खोना तो लगा ही रहता है. इस साल मैंने भी बहुत कुछ पाया. इसी साल मैं आरकुट से भी रूबरू हुआ। इसके जरिये वाकई मुझे अपने कई पुराने दोस्त मिल गये। बिछड़े दोस्तों को मिलाने वाली ये वेबसाइट वाकई में कमाल की है. इसी साल मैंने ब्लागिंग की दुनिया में भी प्रवेश किया. ये दुनिया वाकई में बहुत बड़ी और निराली है. सबसे बड़ी बात है कि इसकी वजह से मेरा लिखना फिर से शुरू हो गया. देश-विदेश में फैले हिंदी लेखकों को देख-पढ़कर बेहद सुखद अनुभूति हुई. हालांकि शुरू में कुछ परेशानी भी हुई. मुझे नाहक ही किसी दूसरे का आयडिया कॉपी करने का आरोप झेलना पड़ा। लेकिन मैं आपने उन ब्लागर साथियों का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मुझे समझा और मुझे बल दिया. मेरा साथ दिया. मेरे कुछ दोस्तों को तो ब्लागिंग के बाद ही मालूम हुआ कि मैं भी लिखने का शौक रखता हूं. ऐसी कई पुरानी रचनायें जो न तो छप सकी थीं और न ही मैं उन्हें कहीं प्राकाशनार्थ प्रेषित कर सका था उन्हें भी मैं अपने ब्लाग पर पेश कर सका। शायद इसलिये क्योंकि ऐसा करने के लिये मुझे किसी संपादक की अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी. साल भर की बातें हैं लिखने में वक्त भी लगेगा और जगह भी. लिहाजा टुकड़े-टुकड़े में मैं लिखने की कोशिश करता रहूंगा. फिलहाल आप सबको नये साल की हार्दिक शुभकामनायें. (क्रमश:)

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | Best Buy Coupons