बुधवार, 25 जून 2014

...जब 'अच्छे दिन' से मुलाकात हो गई


अचानक मेरी नजर सड़क के उस किनारे पर गई जहां सैकड़ों लोग जमा थे। शायद उन लोगों ने किसी को घेर रखा था। भीड़ से जोर-जोर की आवाजें भी आ रही थीं। सब एक साथ बोल रहे थे लिहाजा किसी एक की बात को समझ पाना मुश्किल था। अपने और उनके बीच की दूरी भी उनकी बातें समझने में बाधक बन रही थीं। देखते ही देखते भीड़ के कारण आसपास जाम लग गया। अब मेरे लिए भी वहां से निकलना तकरीबन नामुमकिन हो गया था। उत्सुकतावश मैं भी उस भीड़ की ओर बढ़ गया। यह देखने के लिए कि आखिर यहां हो क्या रहा है?

नजदीक पहुंचा तो देखा लोगों ने सूट-बूट, टाई और ब्रॉन्डेड कपड़ों से लैस एक नौजवान को चारों तरफ से घेर रखा है। ''कौन है यह? सब इसके पीछे क्यों पड़े हैं?" मैंने भीड़ की तरफ सवाल उछालते हुए जानने की कोशिश की। सवाल के जुबान से फूटने की देर थी कि सब लोगों ने मेरी तरफ घूरकर देखा।

मुझे अहसास हो चुका था कि उस नौजवान को न पहचानकर मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया है। जरूर वह कोई बड़ा आदमी होगा जिसे सब जानते हैं। उस भीड़ में मैं ही इकलौता ऐसा इंसान था जो उस नौजवान को नहीं जानता था।

'जानते नहीं ये भइया 'अच्छे दिन' हैं इसीलिए तो सब इन्हें अपने साथ ले जाना चाहते हैं।' भीड़ से एक बुजुर्ग ने समझाने वाले लहजे में मुझे बताया। कोई उसका हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींच रहा था तो कोई उसके पैरों पर गिरा जा रहा है। मैंने देखा भीड़ में मौजूद 31 फीसदी लोग उसे अपनी तरफ खींच रहे हैं। उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं। कोई उससे साथ चलने की गुजारिश कर रहा है तो कोई खुद को किसी बड़े आदमी का दोस्त, रिश्तेदार या जान-पहचान वाला बताकर उस पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है। बाकी 69 प्रतिशत लोग खड़े तमाशा देख रहे हैं। मैं भी उन्हीं 69 फीसदी वालों में घुल-मिल गया।

मैं शर्म के मारे गड़ा जा रहा था,  यह सोचकर कि मैं 'अच्छे दिन' को नहीं पहचानता। ऐसे में भला मेरे दिन अच्छे कैसे बनेंगे। कोई गुंजाइश ही नहीं। 'अच्छे दिन' को पता चलेगा तो बहुत नाराज होगा। अपमानित महसूस करेगा। मेरे साथ तो भूलकर भी नहीं आ सकता। यह सोचकर मैं लौटने के लिए पलटा और 392 नंबर की डीटीसी बस में चढ़ गया।

शुक्र है सीट मिल गई। यह सोचकर मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरे 'अच्छे दिन' आ गए हों। तभी ये देखकर मैं चौंक उठा कि 'अच्छे दिन' नाम का वो नौजवान मेरे बगल वाली सीट पर ही बैठा था। कुछ सकारात्मक जवाब की उम्मीद किए बिना ही मैंने उससे पूछ लिया- ''भाई अच्छे दिन, आप हमारे घर कब आएंगे?''

'आएंगे-आएंगे, आपके घर भी आएंगे, लेकिन अभी तो मैं जरा जल्दी में हूं। ये बस तो एयरपोर्ट की तरफ ही जाती है ना? मुझे थोड़ी देर में मुंबई की फ्लाइट पकड़नी है। एंटालिया में मेरी एक बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग है।'

''एंटालिया में ?'' मैंने कन्फर्म करने के लिए पूछा। ''हां वहीं'', अच्छे दिन ने बहुत ही संक्षिप्त में जवाब दिया और खिड़की से बाहर की ओर झांकने लगा। शायद वह मुझे खास अहमियत नहीं देना चाहता था, इसीलिए इग्नोर कर रहा था। मेरी उससे कोई जान-पहचान भी तो नहीं थी। अब मैं समझ चुका था कि 'अच्छे दिन' साहब फिलहाल मेरे घर तो चलने से रहे। फिर भी मैंने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने की कोशिश की।

''आप उन लोगों के साथ क्यों नहीं गए? कितना प्यार करते हैं वो सब आपको। हर कोई आपको अपने साथ ले जाना चाहता है। और आप हैं कि आपको उनकी भावनाओं की कद्र ही नहीं।''

''नहीं ऐसी बात नहीं है। आजकल मैं जरा ज्यादा बिजी हो गया हूं। आम लोगों से मिलना-जुलना कम ही हो पाता है। वैसे भी इन लोगों को तो आदत है कि मुझे देखकर ही खुश और संतुष्ट हो लेते हैं। अब भी वैसे ही चलेगा। अब आप ही बताओ की मेरे लिए एंटालिया में होने वाली मीटिंग ज्यादा महत्वपूर्ण है या फिर ये भूखे-नंगे लोग? वैसे मैं बता दूं कि इन्ही लोगों के लिए तो मैं इतनी दौड़-भाग करता हूं। बड़े-बड़े लोगों के साथ मीटिंग करता हूं। सबकी जिंदगी में पॉजिटिव बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।''

''भाई साहब, मुझे भी कोई टिप्स दीजिए, आजकल बड़ी आर्थिक तंगी चल रही है। वो पड़ोस वाला टिंकू तो कह रहा था कि जल्द ही सारी प्रॉब्लम खत्म हो जाएंगी। सबके अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे। लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ।''

''आपको पैसे की प्रॉब्लम है ना? तो आप लोन क्यों नहीं ले लेते? रिलायंस फाइनेंस में अच्छा ऑफर चल रहा है। मैं दिलवा दूंगा। एक पर्सेंट कम भी करवा दूंगा। मेरी अच्छी जान-पहचान है। आसान किस्तों में लौटा देना। सिंपल। सारी प्रॉब्लम खत्म। जैसे चाहो खर्च करो। ऐश करो। पिछले एक महीने से तो मैंने कई लोगों को पर्सनल लोन दिलवाया है। आप भी ले लीजिए।''

''अच्छा ये बताइये कि आपका नाम 'अच्छे दिन' किसने रखा? क्यों रखा?'' उसकी सलाह को अनसुना करते हुए मैंने लगातार  दो सवाल दाग दिए।

''ये लो, आपको इतना भी नहीं पता। मेरे नामकरण पर इतना लंबा चौड़ा प्रोग्राम हुआ था। देश भर से लोग बुलाए गए थे। तमाम शहरों में जा-जाकर न्योता दिया गया था और आप पूछ रहे हैं कि नाम किसने रखा? बीस हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए थे मेरे नामकरण में, समझे।''

''जी समझ गया।" मैं निरुत्तर था। चुप हो गया। 'अच्छे दिन' भी खामोश ही बैठा रहा। इस खामोशी को भी मैंने ही तोड़ा। अच्छे दिन से उसका पता पूछकर। जवाब में उसने मुझे अपना विजिटिंग कार्ड पकड़ा दिया और मिलते हैं कभी कहकर अगले ही बस स्टॉप पर उतर गया। मैंने विजटिंग कार्ड देखा तो उसमें 7आरसीआर, नई दिल्ली का पता लिखा था। मैंने उसे संभालकर रख लिया, यह सोचकर कि कभी 'अच्छे दिन' से मिलने जरूर जाऊंगा।

बुधवार, 8 मई 2013

राष्ट्रवादी की डायरी : पहला पन्ना


मैं एक राष्ट्रवादी हूं। राष्ट्रवाद की भावना मेरे अंदर कूट-कूट कर भरी है। इस भावना को पत्थर की तरह कूटा गया था या मिट्टी की तरह ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन इतना जरूर कह स‌कता हूं की जीते जी ये भावना मेरे दिल स‌े निकलने वाली नहीं, बल्कि ये दिनोंदिन बलवती होती जा रही है। आज स‌े मैं अपनी डायरी लिख रहा हूं। इस डायरी के जरिये आप मुझस‌े, मेरे बैकग्राउंड स‌े और मेरे देशप्रेम स‌े ओतप्रोत विचारों स‌े अवगत हो स‌केंगे। आगे कुछ लिखने स‌े पहले मैं अपना परिचय करा दूं। मेरा नाम आरएसएस भाई पटेल है। मेरे पिताश्री का नाम वीएचपी भाई पटेल था। वो गुजरात के रहने वाले थे। मेरा जन्म भी गुजरात में ही हुआ। परवरिश भी वहीं पर हुई।

पिताजी ने हमें बचपन स‌े ही राष्ट्रवादी स‌ंस्कार दिए थे। वह खुद भी कट्टर राष्ट्रवादी थे। स‌ंघ वालों स‌े उनकी बहुत पटती थी। वही स‌ंघ वाले जो अपने स‌ामाजिक कार्यों के लिए विश्व विख्यात हैं। पिताश्री रोजाना स‌ंघ की शाखा में जाया करते थे। वह बताते थे कि स‌ंघ स‌े बड़ा देशभक्त स‌ंगठन दुनिया में नहीं है। उन्होंने अपने आप को पूरी तरह स‌ंघ के रंग में रंग लिया था। जब देखो तब एक खाकी हाफ पैंट में घूमते रहते थे। खाकी औऱ भगवा रंग स‌े पिताजी को खासा लगाव था। असल में वो फौजी बनना चाहते थे, ताकि खाकी ड्रेस पहनकर वो भी देश की स‌ेवा कर स‌कें। लेकिन कद छोटा होने की वजह स‌े फौज में भर्ती नहीं हो पाए। लेकिन दिल में इस बात की कसक हमेशा रही। फिर पुलिस में भर्ती होने के लिए भी हाथ-पांव मारे, लेकिन उस स‌मय पुलिस का बड़ा स‌ाहब दूसरे धर्म वाला था, बस उसी ने लंगड़ी मार दी और पिताश्री पुलिस अफसर बनते-बनते रह गए।

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

चमत्कारी मोदी ताबीज-पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें


हाय, मेरा नाम...है। पहले मैं अपनी जिंदगी स‌े बहुत परेशान रहता था। मेरा कोई भी काम ठीक स‌े नहीं हो पाता था। कई बीमारियां घेरे रहती थीं। काफी इलाज करवाया। कोई फायदा नहीं हुआ। फिर मुझे किसी ने चमत्कारी 'मोदी ताबीज' के बारे में बताया। उस दिन के बाद स‌े तो मेरी जिंदगी ही बदल गई। जिस दिन स‌े मैंने श्रीश्री 1008 मोदी जी महाराज के नाम की ताबीज पहननी शुरू की उसी दिन स‌े मेरी जिंदगी में चमत्कार शुरू हो गए। अचानक मैं खुद को काफी स्वस्थ महस‌ूस करने लगा। आज मेरे दोस्त मुझे देखकर पहचान ही नहीं पाते कि मैं वही हूं। मुझे अब भी यकीन नहीं होता कि यह स‌ब 'मोदी ताबीज' का कमाल है। लेकिन यही स‌त्य है। हालांकि 2002 में मेरे दादाजी ने मुझे 'मोदी ताबीज' के बारे में बताया था। तब 'मोदी ताबीज' नई-नई बाजार में लॉन्च हुई थी। लेकिन तब मैंने दादाजी की बातों पर यकीन नहीं किया। मैं नहीं मानता था कि ताबीज स‌े भी कोई चमत्कार हो स‌कता है। लेकिन 'मोदी ताबीज' पहनने के बाद मेरी यह धारणा बदल गई है। मुझे अफसोस है कि अगर 2002 में ही मैंने दादाजी की बात मानकर 'मोदी ताबीज' पहनी होती तो आज मैं पता नहीं कहां स‌े कहां पहुंच चुका होता। खैर, देर आए, दुरुस्त आए। मैंने अपनी गलती स‌ुधार ली। आप भी मेरी कहानी स‌े स‌ीख लें। 'मोदी ताबीज' घर लाएं, स‌भी स‌मस्याओं स‌े निजात पाएं।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

मैं 'मेरी कोम' को नहीं जानता

मेरी कोम! मैं तुम्हें नहीं जानता
मैं तुम्हें नहीं पहचानता.

क्योंकि तुम फिल्मी स‌ितारों जैस‌ी चमकती नहीं हो
स‌ंज-संवर कर अदा स‌े दमकती नहीं हो.
तुम्हारी चाल 'हीरोइन' जैसी नशीली नहीं है
तुम्हारी अदा कैटरीना जैसी कटीली नहीं है.

तुम हिट फिल्म की हीरोइन की तरह नहीं इतराती.
फेयरनेस क्रीम बेचने की 'स‌ंभावनाएं' भी नहीं जगाती.
तुम्हारे चेहरे पर 'स‌ुपर मॉडल' जैसी चमक नहीं है.
तुम्हारी आवाज में 'इंडियन आइडल' जैस‌ी खनक नहीं है.

तुम अपनी कामयाबियों पर भी नहीं इठलाती.
जुल्फें स‌ंवारकर कैमरों के स‌ामने नहीं आती.
तुम्हारी कमर में 'आइटम गर्ल' वाली लचक नहीं है.
'दर्शकों' को रिझा स‌के, वो कसक नहीं है.

तुम्हें तो 'स्टार पुत्रियों' की तरह
नखरे दिखाना भी नहीं आता है.
अफसोस! तुम्हारी त्वचा स‌े
तुम्हारी उम्र का पता चल जाता है.

तुम टीवी शो में झलक भी नहीं दिखलाती.
बड़ी-बड़ी बातों स‌े लोगों को नहीं भरमाती.
रियलिटी शो के मंच पर ठुमके भी नहीं लगाती.
मर्दाना चाल चलती हो, कमर नहीं मटकाती.

तुम्हारी कहानी में सस्पेंस और थ्रिल नहीं है.
तुम किस्से गढ़ने का स्कोप नहीं दिलाती.
और तो और, तुम्हारा किसी स‌े अफेयर भी नहीं है.
वाकई तुम्हारे व्यक्तित्व में कोई ग्लैमर नहीं है.

तुम्हारे लिए देश की पब्लिक पागल नहीं होती.
औरों की तरह तुम पर तोहफों की बारिश नहीं होती.
तुम 'केबीस‌ी' में पूछे जाने वाले स‌वाल में तो हो.
लेकिन उसके बीच आने वाले 'ब्रेक' में नहीं हो.

स‌च कहूं तो तुम्हारी कोई अदा भड़कीली नहीं है.
तुम अप्सराओं की तरह खूबस‌ूरत नजर नहीं आती.
तुम महंगे-ब्रांडेड कपड़ों स‌े खुद को नहीं स‌जाती.
स‌ुंदर स्त्रियों की तरह बनाव श्रृंगार भी नहीं करती.

इसीलिए, मैं तुम्हें नहीं पहचानता
मेरी कोम तुम कौन हो? मैं नहीं जानता.
(रवींद्र रंजन--25-08-12 )

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

मदेरणा हैं कि मानते नहीं



नेता बेशर्म होते हैं यह तो दुनिया जानती है। लेकिन राजस्थान पूर्व जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा ने बेशर्मी की सारी हदें तोड़ दी हैं। अब भी वही राग अलाप रहे हैं जो उन्होंने सियासत की पाठशाला के पहले दर्ज में पढ़ा था। कहते हैं उनके खिलाफ साजिश हुई है। उन्हें फंसाया गया है। वह संघर्ष करेंगे। इसे ही कहते हैं सब कुछ गंवाकर भी होश नहीं आया। याद कीजिए टेलिविजन पर दिखाई गईं वो तस्वीरें जिसमें सीबीआई मदेरणा को गिरफ्तार करके जोधपुर से दिल्ली ले जा रही थी। उसी वक्त मदेरणा ने मीडिया के सामने ये बेशर्मी भरा बयान दिया कि उन्हें फंसाया गया है। उनके चेहरे पर अपने किए का ना तो कोई अफसोस था और ना ही कोई शर्म-लिहाज। उल्टा मदेरणा साहब तो बेशर्मी की सारी हदें तोड़ने को बेकरार थे।

वैसे भी अब मदेरणा के पास शर्म करने लायक बचा क्या है? सीडी में कैद उनकी 'डर्टी पिक्चर' को दुनिया देख चुकी है। लेकिन मदेरणा हैं कि मानते नहीं। उन्हें अब भी अपनी सियासी विरासत बचाने की फिक्र खाए जा रही है। तभी तो पकड़े जाने पर जैसे हर सफेदपोश खुद को बेकसूर बताता है, अपने खिलाफ साजिश रचे जाने की बात करता है, वही सब अब महिपाल मदेरणा भी कर रहे थे। मदेरणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री है। सियासत के पुराने खिलाड़ी हैं। जाहिर है, आसानी से हार नहीं मानेंगे।

अब जरा मदेरणा की स‌ाहिबजादी की भी थोड़ी चर्चा कर लें। मदेरणा की बेटी दिव्या मदेरणा अपने पिता स‌े कह रह थी कि टेंशन लेने की कोई बात नहीं है। उसका भी यही कहना था कि उसके पिता को फंसाया गया है। उनके पिता की राजनीतिक हत्या करने के लिए यह षड्यंत्र रचा गया है। राजनीति के अभिमन्यु की तरह उसके पिता इस चक्रव्यूह को तोड़ेंगे। दिव्या की बड़बोली बातें स‌ुनकर हमें तो एक ही कहावत याद आई...बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभानअल्ला। सियासत के पुराने खिलाड़ी मदेरणा के मुंह स‌े तो राजनीति के रंग में लिपटे लफ्ज निकलने लाजिमी थे। लेकिन सियासत की एबीसीडी से दूर रही, मदेरणा की साहिबजादी दिव्या भी बाप की जुबान बोल रही थी। ऎसे जता रही थी जैसे उसके पिताश्री बिल्कुल दूध के धुले हैं। किसी ने उन्हें साजिश करके फंसा दिया और वो बेचारे फंस गए।

मदेरणा की बेटी तो काफी देर स‌े मीडिया के स‌ामने आई। उससे पहले उनकी पत्नी लीला मदेरणा ये बयान दे चुकी हैं कि स‌ीडी में होना कोई गुनाह थोड़े हैं। किसी तरह का सीडी बरामद होना या फिर किसी से रिश्ते रखना अपराध नहीं है। लीला ने ये भी कहा था कि ये तो चलता है। राजा-महाराजाओं के वक्त स‌े चला आ रहा है। लीला मैडम की लीला तो वाकई में अपरम्पार है। उन्हें सारी दुनिया विलेन और अपना पति हीरो नजर आता है। पति की असलियत देखकर भी दिखाई नहीं देती। या शायद वह देखना नहीं चाहतीं।

एक बात पर और भी गौर करने लायक है। बाप और मां-बेटी जब भी मीडिया के स‌ामने आईं उनके चेहरे पर अफसोस, रंज या गम की नन्ही स‌ी लकीर भी नजर नहीं आई। मतलब साफ है राजस्थान के मदेरणा ने भी जो किया, अब उसकी बेटी और बीवी मिलकर उस पर लीपापोती करने में जुट गई हैं। बेटी तो मां से भी दो कदम आगे है। उसने अपनी तुलना बेनजीर भुट्टो स‌े कर डाली है। दिव्या मदेरणा का कहना था कि जिस तरह बेनजीर ने पिता की विरासत स‌ंभाली थी उसी तरह वह भी पिता की राजनीतिक विरासत को स‌ंभालेगी। अब अगर अगले चुनावों में मदेरणा की साहिबजादी दिव्या अपने लिए वोट मांगती नजर आ जाएं तो आपको कोई अचरज नहीं होना चाहिए।

शनिवार, 6 मार्च 2010

बीबीसी मुझे माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक सवाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही सम्मान का हकदार बनाते हैं। लेकिन बीबीसी के लिए एक आतंकवादी भी सम्मानित है। कल्पना कीजिए कि अगर मुंबई हमले का गुनहगार आमिर अजमल कसाब बीमार हो जाए तो उसके बारे में लिखी गई बीबीसी की खबर का शीर्षक क्या होगा। शायद वह लिखेगा, 'बीमार हैं कसाब' या फिर 'बीमार हुए कसाब'। अब आप सोचिए कि कसाब के बारे में ऐसा संबोधन पढ़कर एक हिंदुस्तानी को कैसा लगेगा? हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बीबीसी के इन भाषाई तौर-तरीकों में कोई बुराई नजर नहीं आती। वो बड़ी ही बेशर्मी से इसे बीबीसी की 'निष्पक्ष' पत्रकारिता कहते हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वो महात्मा गांधी के हत्यारे के लिए ऐसा सम्मानजनक संबोधन पसंद करेंगे? क्या वो इंदिरा गांधी के कातिल के लिए 'उन्हें' या 'वे' जैसे संबोधन स्वीकार कर पाएंगे?

टीवी चैनलों को भाषा ज्ञान देने वाले इस मुद्दे पर मौन हो जाते हैं। शायद उन्हें लगता है कि वो बीबीसी पर सवाल उठाएंगे तो 'सांप्रदायिक' की श्रेणी में आ जाएंगे। अन्यथा वो थोड़ा सा भाषा ज्ञान बीबीसी को भी क्यों नहीं देते? रुचिका मामले में सबने देखा कि मीडिया की भाषा कैसे रातोंरात बदल गई। जैसे ही हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर की कारगुजारी दुनिया के सामने आई, वो मीडिया की नजर में सबसे बड़ा खलनायक बन गया। एक दिन पहले तक वो महज आरोपी 'थे', लेकिन 24 घंटे बाद ही वो 'गुनहगार' हो 'गया'। चैनल में साफ-साफ 'उसे' रुचिका का गुनहगार कहा जाने लगा। यहां भी यही साबित हुआ कि व्यक्ति के कर्म ही उसे सम्मान का हकदार बनाते हैं। जैसे ही राठौर के कुकर्म उजागर हुए, मीडिया ने उसके लिए सम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करना भी बंद कर दिया।

कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि भाषा सबके लिए एक समान होनी चाहिए। सभी को सम्मान पाने का हक है। बात ठीक है लेकिन उस व्यक्ति को सम्मान पाने लायक भी तो होना चाहिए। हिंदी में अंग्रेजी जैसा नहीं है। इसीलिए हिंदी में दो तरह के संबोधन हैं। तुम और आप। अंग्रेजी में ऐसा कुछ नहीं है। अंग्रेजी में किसी एक व्यक्ति (एक वचन) के लिए 'हैं' या 'वे' नहीं लिखा जाता। इसलिए अगर अंग्रेजी मानसिकता वाले हिंदी में वेबसाइट चलाते हैं तो उन्हें हिंदी भाषा के 'नेचर' और जनमानस का खयाल रखना ही होगा। सिर्फ ये कहकर नहीं बच सकते कि ये तो हमारी 'स्टाइल शीट' है। सवाल ये है कि स्टाइल शीट अगर है भी तो ऐसी क्यों है जिसमें एक आतंकी को सम्मानजनक विशेषण दिया जाता है? वेबसाइट हिंदी में है और हिंदी का पाठक यह कतई नहीं कबूल कर सकता कि लादेन के लिए लिखा जाए कि 'वो ऐसे दिखते होंगे?'

एक साहब हैं जो रोज बीबीसी पढ़ते हैं लेकिन उन्हें आज तक बीबीसी की भाषा में कोई खामी नजर नहीं आई। उल्टा वो हमें दोष देने लगे कि ये आपकी 'सोच' और देखने के नजरिये का दोष है। भई, अगर मुझे लादेन जैसे आतंकवादी को सम्मान देने में आपत्ति है तो मेरी 'सोच' खराब कैसे हो गई? फर्ज कीजिए अगर मैं उन साहब का और उनके परिवार का दुश्मन बन जाऊं। उनको और उनके पूरे परिवार को जान से खत्म करने की ठान लूं। उनके एक-दो रिश्तेदारों को मौत के घाट भी उतार दूं। तब क्या उनके दिल में मेरे लिए कोई सम्मान रहेगा? शायद नहीं। तो सवाल ये है कि हजारों-लाखों बेकसूर लोगों की जान लेने वाला आतंकी लादेन कैसे सम्मानित संबोधन का हकदार हो सकता है?

इसी तरह अगर हिंदी में खबर लिखी जा रही है और जिक्र महात्मा गांधी की मौत का हो रहा है तो नाथूराम गोडसे क्या सम्मानित संबोधन का हकदार हो सकता है? लादेन को 'हैं' और 'वे' जैसे संबोधन किसी भी कीमत पर नहीं दिए जा सकते। बीबीसी हिंदी की भाषा के पैरोकारों से मैं कहना चाहूंगा कि जरा आत्मविश्लेषण करके देखें कि निचले तबके में रहने वाले और उनकी नजर में साफ-सफाई जैसे तुच्छ काम करने वाले लोगों को वो कितनी बार 'आप' कहकर संबोधित करते हैं, जबकि हकीकत तो ये है कि वो लोग सम्मान के पूरे हकदार हैं क्योंकि वह अपना काम ईमानदारी से करते हैं। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। इसके बावजूद हकदार होते हुए भी हम उन्हें सम्मान देने में कतराते हैं। इसके विपरीत कातिल, गुनहगार और आतंकी को सम्मान देने में उन्हें बुराई नजर नहीं आती? शायद इसलिए क्योंकि ऐसा एक विदेशी संस्था कर रही है और विदेशी जो भी करते हैं वो ऐसे लोगों को महान नजर आता है। ऐसे लोगों को वो सिर आंखों पर बैठाते हैं। वह कचरा भी परोसे तो हमें सोना लगता है। ऐसे लोगों के लिए तो हम यही कहेंगे कि उन्हें अपनी आंखें खोलनी चाहिए और दिमाग के बंद दरवाजे को भी खुला रखना चाहिए।

कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने तो मुझ पर एक अजीबोगरीब आरोप मढ़ डाला। वो खुद को सेकुलर साबित करना चाहते थे लिहाजा उन्होंने हम पर आरोप लगा दिया कि हम बीबीसी हिंदी पर ऐसे सवाल इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि उसकी संपादक सलमा जैदी एक मुसलमान हैं। इसी आधार पर उन्होंने हमें दक्षिण चरमपंथी भी घोषित कर दिया। हमें तो तरस ही आई उनकी सोच पर। उन्होंने बीबीसी की एक-दो खबरों का उदाहरण देकर ये भी साबित कर दिया कि चूंकि बीबीसी बाला साहेब ठाकरे के लिए भी सम्मानजनक संबोधन इस्तेमाल करता है इसलिए लादेन भी सम्मान का हकदार है। चूंकि वो यह मान चुके हैं कि बीबीसी की भाषा पर सवाल उठाने वाला एक दक्षिण चरमपंथी है, इसीलिए शायद उन्होंने बाल ठाकरे का उदाहरण पेश किया। इस पर मैं कहना चाहूंगा कि बाल ठाकरे हों या राज ठाकरे अगर कोई संगीन गुनाह करते हैं तो वो भी सम्मान के जरा भी हकदार नहीं है। एक और साहब ने इसे बीबीसी की निष्पक्ष पत्रकारिता बताया। यानी आतंकी का सम्मान करना उनकी नजर में निष्पक्ष पत्रकारिता की श्रेणी में आता है। उन्होंने ये भी तर्क दिया कि पत्रकार को किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। लेकिन जरा आप ही सोचिए कि लादेन के बारे में लिखते वक्त क्या पक्ष और विपक्ष की गुंजाइश रहती है?

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

'फिदा' के जाने पर ये स्यापा क्यों?

-कुंदन शशिराज
मकबूल कतर जा रहे हैं। अब वहीं बसेंगे और वहीं से अपनी कूचियां चलाएंगे.. ये खबर सुनकर हिंदुस्तान में कुछ लोगों को बड़ा अफसोस हो रहा है। इस गम में वो आधे हुए जा रहे हैं कि कुछ अराजक तत्त्वों के चलते एक अच्छे कलाकार को हिंदुस्तान छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पूरे ड्रामे को देखकर उन तथाकथित सहिष्णु लोगों पर हंसी, हैरानी और गुस्सा आता है। 95 साल का एक बूढ़ा जो अब तक आम लोगों की भावनाओं को अपनी कला के जरिये ठेंगे पर दिखाने की कोशिश करता आया है, जब वो खुद अपनी मर्जी से, अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए हिंदुस्तान छोड़ कर जा रहा है तो फिर ऐसे लोगों का कलेजा भला क्यों फट रहा है..? क्यों.. क्योंकि उनके पास आधी-अधूरी जानकारी है। ऐसे लोगों को चाहिए कि वो इस पूरे ड्रामे को अपनी सहिष्णुता का झूठा चश्मा उतारकर ईमानदारी से देखें।

मकबूल कतर में बस रहे हैं क्योंकि वहां उन्हें शाही परिवार का चारण बनकर शाही परिवार के लिए पेंटिंग बनाने का काम मिल गया है और जाहिर तौर पर जिंदगी को विलासिता से जीने के लिए वो शाही परिवार इस कलाकार को बेशुमार पैसा दे रहा है। पैसा इस करोड़पति कलाकार की पुरानी कमजोरी रही है। ये तस्वीरें सिर्फ अमीरों के ड्राइंग रूम के लिए बनाते हैं। इनकी करोड़ों की पेंटिंग्स खरीदने वाले धनपशुओं के लिए समाज का मतलब उनकी पेज थ्री सोसायटी होती है और खाली वक्त में टीवी चैनलों पर बैठकर किसी को भी धर्मनिरपेक्ष और धर्मांध होने का सर्टिफिकेट बांटना उनका शौक होता है। सवाल ये है कि हुसैन ने कुछेक 'पेंटिंग' बनाने के अलावा इस देश के लिए क्या कुछ सार्थक किया है? क्या उन्होंने गरीब.. अनाथ बच्चों के लिए कोई एनजीओ खोला या क्या उन्होंने पेंटिंग के जरिये कमाई अपनी करोड़ों-अरबों की दौलत का एक छोटा सा हिस्सा भी इस देश के सैनिकों के लिए समर्पित किया? मकबूल ने जो कुछ भी किया सिर्फ अपने लिए किया।

तर्क देने वाले तर्क देते हैं कि एक कलाकार को कला की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जरूर मिलनी चाहिए लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वो अपनी इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल बार-बार दूसरों की सहनशक्ति का परीक्षण करने के लिए करें? कहते हैं अश्लील पेंटिंग्स का विरोध हुआ तो मकबूल व्यथित हो गए। सरकार ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया, लेकिन मकबूल को भरोसा नहीं हुआ। दरअसल मकबूल को समझ में आ गया था कि सरकार पर भरोसा न करने से पब्लिसिटी कुछ ज्यादा ही मिल रही है। लोगों के बीच इमेज एक ऐसे 'निरीह प्रतिभावान' कलाकार की बन रही है, जो अतिवादियों का सताया हुआ है। ये तो वाकई कमाल है। दूसरों की भावनाएं आपके लिए कुत्सित कमाई का सामान हैं। उस पर अगर विरोध हो तो आप बौद्धिक बनकर उनके विरोध पर भी ऐतराज जताने लगें।

अगर आपका दिल इतना ही बड़ा था तो आप एक माफी का छोटा सा बयान जारी कर खुद के एक दरियादिल कलाकार होने का परिचय दे सकते थे? मामले को शांत कर सकते थे। लेकिन आपके लिए न तो हिंदुस्तान के भावुक लोग कोई अहमियत रखते हैं और न ही हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था का आपके लिए कोई मतलब है। अश्लील पेंटिंग का मामला कोर्ट में गया तो इस 'कलाकार' ने एक बार भी कोर्ट में हाजिर होना जरूरी नहीं समझा। कोर्ट ने इसे अवमानना के तौर पर लिया और फिर मकबूल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया, फिर भी मकबूल को अक्ल नहीं आई। आती भी कैसे? अक्ल न आने की कीमत पर ही तो इतनी सारी पब्लिसिटी और करोड़पतियों के ड्राइंग रूम में पेंटिंग रखे जाने का कीमती तोहफा मिल रहा था। कतर में बसने की खबर भी मकबूल ने ऐसे फैलाई है, जैसे वो इसके जरिये हिंदुस्तान के मुंह पर तमाचा रसीद करने की खवाहिश पूरी कर रहे हों।

दुबई में डेरा डाले हुसैन ने एक अंग्रेजी दैनिक को खुद अपनी तस्वीरें भेजी और कतर की नागरिकता मिलने की खबर दी। एक अखबार को खबर देने का मतलब ये था कि ये खबर पूरे देश में फैले। सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद मकबूल के दिल में इस मुल्क में बसने की कोई ख्वाहिश नहीं है। अगर ये ख्वाहिश होती तो फिर इस देश में लौट आने के कई बहाने मकबूल के पास होने चाहिए थे। अगर बात विरोध की ही थी तो जितना विरोध 'माई नेम इज खान' का हुआ, उतना मकबूल का तो कतई नहीं हुआ था। 'खान' बढ़िया तरीके से रिलीज भी हुई और शाहरूख आज भी अपने मन्नत में उसी शान के साथ रह रहे हैं, जैसे पहले रहते थे।

दरअसल मकबूल में खुद को सताया हुआ कलाकार दिखाने का शौक कुछ ज्यादा ही था। इसके साथ ही मकबूल का 'कला' बाजार दुबई और कतर जैसे अरब मुल्कों में खूब बढ़िया चलने भी लगा था। तेल भंडारों से बेशुमार पैसा निकाल रहे शेखों के पास अपने हरम पर खर्च करने के अलावा मकबूल की पेंटिंग खरीदने के लिए भी खूब पैसा है। मकबूल को और चाहिए भी क्या? सवाल ये है कि कतर में मकबूल को अपना बाजार दिख रहा है या फिर मकबूल को वाकई कतर में किसी कमाल की धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता की आस है? अगर ऐसा है तो फिर मां सरस्वती की तरह ही कतर में मकबूल बस एक बार अपने 'परवरदिगार' की एक 'पेंटिंग' बना दें.. फिर देखते हैं, जिस कतर ने आशियाना दिया है वो कतर मकबूल को एक नया आशियाना ढूंढने का वक्त भी देता है या नहीं। (इस पोस्ट के लेखक कुंदन शशिराज एक हिंदी न्यूज चैनल में काम करते हैं)

 
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