शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

कुत्ता कहीं का...

2009 कब का आ चुका है। दो महीने गुजर भी चुके हैं। अचानक याद आया कि इस स‌ाल अभी तक हमने कुछ लिखा ही नहीं। स‌ोच रहा हूं कहीं लिक्खाड़ लोग मुझे बिरादरी स‌े बाहर न कर दें। इसीलिए कुछ तो लिख ही डालता हूं। नए स‌ाल के दो महीने गुजर चुके हैं। स‌ब ठीक ही चल रहा है। मंदी अब भी बरकरार है। एक नई बात हुई मेरी कॉलोनी की ऊबड़-खाबड़ स‌ड़क बन गई है। पता नहीं क्यों बन गई। अभी तो चुनाव भी दूर है। स‌ड़क के किनारे गंदी स‌ी जमीन को खोदकर जो नींव डाली गई थी वहां अब ऊंची इमारत खड़ी हो गई है। इतनी ऊंची कि स‌िर उठाकर देखने पर गर्दन दर्द करने लगती है।
मेरी गली का कुत्ता अब भी आदमियों पर भोंकता है। वह नहीं बदलेगा। कुत्ता कहीं का। बिल्लियां अब कम ही नजर आती हैं। कौवे और तोते भी नजर नहीं आते। कभी कभार कबूतर दिख जाते हैं लेकिन वह भी अब गुटुर-गुटुर की बजाय डरावनी आवाज निकालते हैं। पता नहीं क्यों? शायद नाराज हैं हम स‌बसे। हमने ही तो छीना है परिंदों का आशियाना। गेट का चौकीदार अब भी चार हजार महीने में खर्च चलाता है। मंदी न होती तो भी उसका खर्च इतने स‌े ही चलता।
पड़ोसी ने कार ले ली है बड़ी वाली। ख्वाहिशें भी अजीब चीज हैं। छोटे घर में रहता हूं तो बड़ा घर लेने की तमन्ना है। जो छोटी गाड़ी मे चलता है उसे बड़ी गाड़ी की हसरत है। जो 10 हजार की नौकरी करता है उसे 20 हजार की हसरत है। फिलहाल तो मंदी ने स‌बकी हसरतों पर विराम लगा रखा है। लोगों ने स‌पने देखने भी कम कर दिए हैं। बंद नहीं किए। करना भी नहीं चाहिए। स‌पने देखेंगे नहीं तो स‌च कैसे होंगे। कई दोस्तों ने नौकरी बदल ली है। मेरे आफिस के पास घूमने वाला कुत्ता अब मोटा हो गया है। उसने अपना परिवार भी बढ़ा लिया है। शायद उसे पता नहीं कि मंदी चल रही है। कुत्ता कहीं का।
प्रेस वाले ने रेट बढ़ा दिए हैं। स‌ोसायटी के टेक्नीशियन ने भी अपना चार्ज बढ़ा दिया है। शुक्र है स‌ोसायटी वालों ने अपना चार्ज नहीं बढ़ाया। शायद उन्हें पता है कि मंदी का मौसम है। मैं बहुत मंदी-मंदी रट रहा हूं ना? क्या करूं मंदी का ही तो जमाना है। मंदी कई लोगों के लिए तो बड़ी काम की चीज है। कई लोगों ने इसी का स‌हारा लेकर अपने दुश्मनों का स‌फाया करवा दिया। जिसस‌े डर था कुर्सी छिनने का उसी को नौकरी स‌े निकलवा दिया।
एक बात बड़ी अच्छी हुई कई चीजें स‌स्ती हो गईं। अभी एक दिन कोई न्यूज चैनल ढिंढोरा पीट रहा था कि अब स‌ब कुछ स‌स्ता हो गया। जो चाहे ले आओ। ऎस‌े बता रहा था जैसे लूट मच गई हो। आओ-आओ लूट लो। अभी तो दो महीने ही गुजरे हैं। अभी तो बहुत कुछ बाकी है। अरे हां, आज वह गली का कुत्ता फिर मिल गया था। लौटते वक्त। भोंकने लगा। पता नहीं उसे क्या परेशानी है? शायद उसे यह भी नहीं पता कि महंगाई कम हो गई है। वर्ना भोंकने में वक्त क्यों बर्बाद करता। वह भी कहीं जाकर सस्ता माल लूट रहा होता। पता नहीं कब स्मार्टनेस आएगी इसमें। कब स‌ीखेगा। कुत्ता कहीं का।

2 comments:

राजीव जैन Rajeev Jain ने कहा…

बहुत बडिया

NALINI TEWARI RAJPUT ने कहा…

अच्छा विश्लेषण है। टाइटेल ने पोस्ट पढ़ने की तरफ आकर्षित कर दिया।

 
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