गुरुवार, 4 अक्तूबर 2007

संपादक के नाम पत्र

परम आदरणीय संपादक महोदय,
मैं आपके अखबार का पुराना पाठक हूं। उम्मीद है आप मुझे जानते होंगे। मैं पहले भी आपको कई पत्र लिख चुका हूं। हो सकता है वो आपको न मिले हों। मैंने अपनी कई रचनायें भी आपको प्रकाशनार्थ भेजी थीं, लेकिन पता नहीं क्यों वो प्रकाशित नहीं हुईं। जरूर वो आप जैसे विद्वान की आंखों के सामने से नहीं गुजर सकी होंगी। मैं बचनपन से ही आपके समाचार पत्र का नियमित पाठक हूं। आपके अखबार में प्रकाशित सारी सामग्री बेहद खोजपरक, रोचक व तथ्यपूर्ण होती है। आपके द्वारा लिखे गये संपादकीय विचारपरक और 'निष्पक्ष' होते है, जो हमें 'बहुत कुछ' सोचने को मजबूर कर देते हैं।
हर रविवार को परिशिष्ट के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित आपकी कविता तो अत्यंत उच्चकोटि की होती है। मेरा एक मित्र कहता है कि उसे समझ में ही नहीं आता कि आप अपनी कविता में कहना क्या चाहते हैं? इसमें भला उसका क्या दोष? 'बेचारे' की समझ 'छोटी' है। आपकी कवितायें कोई उसके जैसे कम समझ वालों के लिये थोड़े ही हैं। इसके लिये तो कोई आप जैसा बुद्धिजीवी ही होना चाहिये। मुझे तो पूरे हफ्ते आपकी इस साप्ताहिक कविता का इंतजार रहता है। मुझे आश्चर्य होता है कि आप 'इतनी अच्छी' कविता हर सप्ताह कैसे लिख लेते हैं। अन्य कवियों को आपसे अवश्य ही जलन होती होगी कि आपने अब तक हजारों कवितायें लिखी ही नहीं, बल्कि वो 'प्रकाशित' भी हुई हैं।...और हर रविवार को अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित आपके संपादकीय का तो कोई जवाब ही नहीं है। इसके बीच-बीच में आप जो शेरो-शायरी करते हैं उससे तो संपादकीय पढ़ने का 'मजा' और भी बढ़ जाता है। आपके संपादकीय पृष्ठ में छपने वाले स्तंभकारों के 'विचारों' का तो मैं कायल हो चुका हूं। हर हफ्ते उन्हीं लेखकों को अगर आप स्थान देते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। बार-बार उन्हीं नामों व विचारों को देख-पढ़कर मैं कतई बोर नहीं होता हूं। यह तो आपका 'विशेषाधिकार' है। और फिर, आजकल ऐसे लेखक हैं ही कितने जिनका लेखन इतना स्तरीय हो कि उसे आपके अखबार में जगह दी जा सके?
मैंने एक लेखक, जो मेरी नजर में तो महा टटपुंजिया ही है, को कहते सुना है कि आप अपने अखबार में लिखने वालों को पारिश्रमिक नहीं देते। ठीक ही तो है। जब लोग फ्री में लिखने के लिये तैयार हैं तो भला अनावश्यक पैसा बर्बाद करने की क्या जरूरत है? वह तो ये भी कह रहा था कि आप लेखकों के नाम का पैसा खुद हड़प लेते हैं। अरे भई, इसमें हड़पना कैसा? जिन पैसों की बचत आपने की वह तो स्वाभाविक रूप से आपका है। जरूर कभी आपने उसकी कोई रचना अस्वीकृत कर दी होगी तभी वह आपसे खार खाये बैठा होगा और आप के संबंध में ऐसी-वैसी बातें उड़ाता फिर रहा है। लेकिन मैं उस पर बिल्कुल यकीन नहीं करता। यकीनन आप भी नहीं करेंगे। करना भी नहीं चाहिये।
शायद उसे नहीं मालूम कि संपादक पद पर पहुंचने के लिये कितनी योग्यता और संघर्ष की जरूरत होती है। मैं समझ सकता हूं कि आप एक 'सब एडीटर' पद से कितनी 'मेहनत' करके यहां तक पहुंचे हैं। तभी तो मैंने सुना है कि रोज सुबह आपको मीटिंग के लिये अपने घर बुलाते हैं। मेरा एक और मित्र है। मित्र क्या चिपकू है। आपके अखबार में ही काम करता है। कह रहा था कि हाईस्कूल पास एक रिश्तेदार को आपने संयुक्त संपादक बनवा दिया है। मैं कहता हूं भला इसमें बुराई क्या है? पत्रकारिता करने के लिये डिग्रियां किस काम कीं? इसके लिये तो बस पत्रकारिता के 'कुछ आवश्यक पहलुओं' की जानकारी होनी चाहिये, जो आपने उन्हें बखूबी दे ही दी होगी।
और हां, वह कह रहा था कि संपादक होने के बावजूद आपके नाम से मुख्य पृष्ठ पर समाचार छपता है। जबकि वास्तव में वह रिपोर्ट किसी औऱ की होती है। क्योंकि आप तो अपने केबिन से बाहर निकलते ही नहीं हैं। अब भला उसको कौन समझाए, भला संपादक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति रिपोर्टिंग करेगा तो सारे रिपोर्टर किस लिये रखे गये हैं। फिर संवाददाताओं की सारी खबरों पर संपादक का ही तो अधिकार होता है। वह जिस तरह चाहे 'अखबार के हित में' उनका उपयोग करे। अरे मैं तो कहता हूं कि ऐसे रिपोर्टरों को तो और खुश होना चाहिये कि उनकी रिपोर्ट संपादक के नाम की बाईलाइन छपने के बाद कहीं अधिक पढ़ी जायेगी। लेकिन इनका भी क्या दोष है? इनमें इतनी बुद्धि ही कहां है कि ये इतनी दूर की सोच सकें। ये तो बस जल-कुढ़ कर आलोचना पर उतर आते हैं। मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों से आप विशेष सावधान रहें।
मुझे पता चला है कि आजकल वह...अरे वही, जिसने मुझसे ये सब बातें कहीं, अक्सर अखबार के मालिक के घर चक्कर काटा करता है। कहीं आपके संबंध में कुछ उल्टा-सीधा न भिड़ा दे औऱ आपकी 'छवि' खराब हो जाये। एक दिन कहने लगा हमारे संपादक को तो कुछ आता-जाता ही नहीं है। सरकारी नौकरी नहीं मिली तो तिकड़म करके पत्रकारिता में घुस गया। उसे क्या मालूम कि आप जैसा व्यक्ति अगर नौकरशाही में फंस जाता तो आज आपके जरिये पत्रकारिता ने जो मुकाम हासिल किया है उसका क्या होता? आपकी छत्रछाया और मार्गदर्शन में इतने बेरोजगार युवाओं ने पत्रकारिता में जो 'करिअऱ' हासिल किया है उसका क्या?
एक दिन कहने लगा कि आपने जिन लड़कों को नियुक्त किया है उनकी शैक्षिक डिग्रियां फर्जी हैं। मैं तो नहीं मानता। अगर यह सच है भी तो मेरी आपके प्रति श्रद्धा पहले से भी ज्यादा बढ़ गई है। क्योंकि एक तरह से आपने उन युवाओं, जो वास्तव में मामूली रूप से पढ़े-लिखे हैं, को तराश कर हीरा बना दिया है। आप पर तो देश के पत्रकारिता जगत को गर्व होना चाहिये।
मुझे यकीन है कि पुलित्जर पुरस्कार देने वालों की नजर एक न एक दिन आपके गौरवमयी योगदान पर जरूर पड़ेगी। वैसे मुझे तो उस टटपुंजिया पत्रकार की सारी गतिविधियां ही 'संदेहास्पद' लगती हैं। कह रहा था कि हाल ही में आपने जो बंगला लिया है उसके लिये आपने पेमेंट नहीं किया। वह आपको एक बिल्डर ने भेंट किया है। आपने प्रधानमंत्री से उसका कोई 'बहुत बड़ा काम' करवा दिया है। तो इसमें क्या हो गया? आपको पारिश्रमिक देने से परहेज है। पारिश्रमिक लेने में क्या हर्ज है? और अगर कोई अपनी खुशी से कुछ देता है तो इनकार करना भई तो अच्छा नहीं लगता। अगर जनप्रतिनिधि जनता के कार्य करने के अपने कर्तव्य को ठीक से नहीं निभाते हैं और आपने उनके कार्य को अपना कर्तव्य समझ के कर दिया तो आप प्रशंसा के हकदार हैं।
छोड़िये जाने दीजिये। आप एक कुशल संपादक की तरह अपने 'अखबार पर ध्यान' दे रहे हैं यह किसी को नहीं दिखाई देता। चिंता मत कीजिये। पाठक तो हैं आपके काम को सराहने वाले। इन टटपुंजिया पत्रकारों की आपके सामने औकात ही क्या है? अऱे हां, पिछले रविवार को आपने 'हिंदुत्व' पर जो लेख लिखा था, काफी उत्कृष्ट था। और वो जो आपने एक नया स्तंभ शुरू किया है राजनीतिक गतिविधियों पर, वह भी काफी अच्छा है। वह पत्रकार (वही आपके अखबार में काम करने वाला) कह रहा था कि उसमें आप एक विशेष पार्टी का ही बखान करते रहते हैं। कह रहा था कि इस तरह से आप उस पार्टी के जरिये राज्यसभा में पहुंचना चाहते हैं। तो मैं कहता हूं, भला इसमें बुराई क्या है? संपादक जैसा 'बुद्धिजीवी' व्यक्ति अगर राज्यसभा पहुंचता है तो इससे राज्यसभा की गरिमा बढ़ेगी ही। आप खुद ही देखिये, आज कई बड़े पत्रकार सरकार में हैं। वह कितना बेहतर काम कर रहे हैं। यहां तक कि वहां भी वह अपनी 'निष्पक्षता' वाली कार्यशैली नहीं भूले हैं। पिछले दिनों कई पत्रकारों पर हमले हुये, उन्हें झूठे मुकदमों (उनके अनुसार) में फंसाया गया। लेकिन सरकार में बैठे पत्रकार उनके समर्थन में एक शब्द तक नहीं बोले। अरे भई, अगर वे ऐसा करते तो लोग उन पर आरोप लगाने लगते कि ये नेता पत्रकार बिरादरी का है इसलिये उनका पक्ष ले रहा है। जरूर ये अपने समय में 'निष्पक्ष पत्रकार' नहीं रहा होगा।
अंत में यही कहना चाहूंगा कि आप इसी तरह अपने पाठकों का हमेशा खयाल रखते रहें। आज आपका अखबार देश में 'नंबर वन' है, वह दिन दूर नहीं जब यह दुनिया भर में नंबर वन हो जायेगा। बस आप लगे रहें इसी तरह।
कृपया अन्यथा न लें, आपके सम्मानित समाचार पत्र में प्रकाशनार्थ एक रचना संलग्न कर रहा हूं उसे व्यक्तिगत रूचि लेकर प्रकाशित करने का कष्ट करें। मेरा पत्र तो खैर आप प्रकाशित करेंगे ही। धन्यवाद।
आपका
रवींद्र रंजन

7 comments:

आशीष ने कहा…

bahut khoob janab

संजय बेंगाणी ने कहा…

प्रिय पाठक,
आपकी रचना प्रकाशित की जा रही है. परिश्रमिक भी भेजा जा रहा है, इस पत्र का जिक्र किसी न करें व चिट्ठे पर तो बिलकुल न छापें.

आपका अपना ही समझो
सम्पादक

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

चलिये हमें भी नुस्खे पता चल रहे हैं अपनी रचना छपवाने के। बढ़िया जी!

Udan Tashtari ने कहा…

सही तरीका है. :)

SRIJANSHEEL ने कहा…

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Anil kumar ने कहा…

बहूत सही..तीर लगे पर एहसास ना हो..

अबयज़ ख़ान ने कहा…

सही बैंड बजाई है। अरसे बाद कुछ अच्छा पढ़ने को मिला है।

 
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