बुधवार, 30 जनवरी 2008

माई बेस्ट फ्रैंड मर्डर...

माई बेस्ट फ्रैंड मर्डर। यह नाम किसी फिल्म का नहीं बल्कि वह सच्ची कहानी है जिसे सुनकर एक बार तो दिल्ली पुलिस को भी इसकी सच्चाई पर यकीन नहीं हुआ। वो इसलिये कि एक दोस्त ने अपने ही हाथों से अपने बेस्ट फ्रैंड की जान ले ली। खास बात यह है कि यह सब अचानक नहीं हुआ, बल्कि पूरी तरह सोच-समझकर हुआ। हां-यह अलग बात है कि मर्डर करने वाले का मकसद मर्डर नहीं मनी था। राधेश्याम नाम के इस शख्स के हाथ में मौजूद यह तस्वीर गवाह है उन खुशनुमा लम्हों की जो कभी इसके बेटे धर्मेंद्र (तस्वीर में दायें) ने अपने दोस्त पिंटू के साथ गुजारे थे। लेकिन अब इस खूबसूरत तस्वीर का रुख उलट चुका है। पिंटू और धर्मेंद्र एक दूसरे से हमेशा के लिये जुदा हो चुके हैं। 12 बरस का धर्मेंद्र अब इस दुनिया में नहीं है और उसका बेस्ट फ्रैंड पिंटू इस वक्त सलाखों के पीछे है। वह भी अपने ही दोस्त धर्मेंद्र की हत्या के इल्जाम में। हो सकता है अब जो कहानी हम आपको सुनाने जा रहे हैं उसे सुनकर बरबस आपके मुंह से निकल पड़े कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन यकीन मानिये ये सच है।
यह कहानी है दो दोस्तों की। नाम है पिंटू और धर्मेंद्र। पिंटू और धर्मेंद्र दिल्ली के शक्ति गार्डन इलाके के आईकॉन पब्लिक स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ते थे। 25 जनवरी की सुबह धर्मेंद्र अपने स्कूल तो गया लेकिन देर शाम तक वापस नहीं लौटा। परेशान होकर धर्मेंद्र के घरवालों ने नंदनगरी थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी। रिपोर्ट दर्ज करने के बाद इलाके की पुलिस ने धर्मेंद्र की तलाश शुरू कर दी। काफी कोशिश के बाद भी धर्मेंद्र का कोई सुराग तो नहीं मिला हां, अगले ही दिन पुलिस को अशोक नगर रेलवे क्रासिंग से उसकी लाश जरूर मिल गई।
किसी ने कत्ल के बाद मासूम धर्मेंद्र की लाश को रेलवे क्रासिंग पर ठिकाने लगा दिया था। लाश की बरामदगी के बाद दिल्ली पुलिस के लिये सबसे बड़ी चुनौती थी धर्मेंद्र के कातिल तक पहुंचने की। कत्ल की तफ्तीश में जुटी पुलिस को यह सवाल बार-बार परेशान कर रहा था कि आखिर मासूम धर्मेंद्र की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती है? लेकिन काफी कोशिश के बाद भी पुलिस को धर्मेंद्र का कोई दुश्मन नहीं मिला। तब पुलिस ने शुरू की धर्मेंद्र के दोस्तों की तलाश। पता चला कि आखिरी बार धर्मेद्र को उसके दोस्त पिंटू के साथ देखा गया था।
जब पुलिस ने पिंटू को ढूंढना शुरू किया तो वह भी शहर से गायब मिला। साथ ही गायब मिला उसका एक और दोस्त राजकुमार उर्फ रिंकू। रिंकू की तलाश में दिल्ली पुलिस की टीम उसके घर बुलंदशहर जा पहुंची। वहां रिंकू तो पुलिस के हाथ नहीं लगा, हां पिंटू जरूर पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पिंटू ने जो कहानी पुलिस को सुनाई वह रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। पुलिस के मुताबिक रिंकू के साथ मिलकर पिंटू ने ही अपने दोस्त धर्मेंद्र का अपहरण किया था। मकसद था उसके पिता से फिरौती में मोटी रकम वसूलना। लेकिन जब साजिश कामयाब नहीं हो सकी तो दोनों ने मिलकर धर्मेंद्र का कत्ल कर दिया और लाश को रेलवे क्रासिंग पर फेंक दिया। शायद यह सोचकर कि किसी को उनकी साजिश की भनक नहीं लग पाएगी, लेकिन उनका ऐसा सोचना गलत था। दोस्त का कातिल पिंटू इस वक्त सलाखों के पीछे (बाल सुधार गृह में) है। अब दिल्ली पुलिस को तलाश है उसके फरार दोस्त रिंकू की।

कैसे मिला कातिल का सुराग?
मासूम धर्मेंद्र के कत्ल की साजिश से शायद अभी परदा नहीं उठ पाता अगर पुलिस को मौका-ए-वारदात से एक अहम सुराग नहीं मिला होता। वो सुराग था कपड़े का एक टुकड़ा। उस टुकड़े को तफ्तीश का जरिया बनाकर दिल्ली पुलिस उस वर्कशाप तक जा पहुंची जहां उस तरह के कपड़ों की काट-छांट का काम होता था। वह वर्कशाप किसी और की नहीं बल्कि पिंटू के पिता की थी। दिल्ली पुलिस के मुताबिक पिंटू ने अपने दोस्त धर्मेंद्र के अपहरण की साजिश अपने पिता की वर्कशाप में काम करने वाले राजकुमार उर्फ रिंकू के इशारे पर रची थी। पिंटू और रिंकू आपस में दोस्त बन गये थे। रिंकू ने दोस्ती वास्ता देकर पिंटू को धर्मेंद्र के अपहरण की साजिश को अंजाम देने के लिये तैयार कर लिया। पुलिस के मुताबिक रिंकू ने पिंटू से कहा था कि उसे अपने घरवालों को भेजने के लिये कुछ पैसों की सख्त जरूरत है। रिंकू को अपना दोस्त समझने वाला पिंटू उसकी मदद करने को तैयार हो गया। इसी का फायदा उठाकर रिंकू ने पिंटू से कहा कि अगर दोनों मिलकर उसके दोस्त धर्मेंद्र का अपहरण कर लें तो उसके पिता से फिरौती में मोटी रकम वसूली जा सकती है। रिंकू की बात सुनकर पिंटू उसकी मदद के लिये तैयार हो गया। दोनों ने मिलकर एक साजिश रची। साजिश के तहत एक दिन पिंटू और रिंकू ने धर्मेंद्र को खेलने के बहाने अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा लिया। उसके बाद पिंटू, धर्मैंद्र को अपने पापा की बंद वर्कशाप में ले गया। वहां दोनों ने मिलकर धर्मेद्र से पहले तो मारपीट की, फिर धर्मेद्र के पिता को पैसे के लिये फोन भी किया। लेकिन बात बन नहीं सकी। इसी खुन्नस में दोनों धर्मेंद्र की जान के दुश्मन बन बैठे। रिंकू के इशारे पर पिंटू ने धर्मेंद्र के दोनों हाथ पकड़ लिये और फिर रिंकू ने उसका गला दबा दिया। रात को दोनों ने मिलकर धर्मेंद्र की लाश को दिल्ली के अशोक नगर रेलेवे क्रासिंग पर फेंक दिया औऱ वहां से भाग कर बुलंदशहर चले गये। लेकिन बुलंदशहर जाकर भी पिंटू दिल्ली पुलिस से बच नहीं पाया। उसका साथी रिंकू जरूर मौका पाकर भाग निकला। हालांकि पुलिस का दावा है कि जल्द हो वह भी सलाखों के पीछे होगा।

कौन है जिम्मेदार?
जमाना बदल गया है। अब बच्चे अपने नाना-नानी से परियों की कहानी नहीं सुनते। चंदा मामा की बात नहीं करते। गुड्डे-गुड़ियों से नहीं खेलते। अब उनके मनोरंजन का साधन बन गये हैं हिंसक वीडियो गेम, डब्ल्यू-डब्ल्यूएफ और एक्शन से लबरेज फिल्में। तो आखिर ऐसे माहौल में परवरिश पाने वाले बच्चों इन चीजों को असल जिंदगी में अपनाने की कोशिश क्यों नहीं करेंगे। पढ़ने और खेलने की उम्र में पिंटू ने अपने ही दोस्त के अपहरण और कत्ल जैसी सनसनीखेज वारदात को अंजाम देकर लोगों को एक बार फिर ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर आजकल के बच्चों को हो क्या रहा है? ऐसी कौन की वजह है जिसके कारण बच्चे रचनात्मक चीजों से मुंह मोड़कर गुनाह की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। मनोचिकित्सक तो इस मामले में सबसे ज्यादा परिवार को ही जिम्मदार ठहराते हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक हिंसक वीडियो गेम, एक्शन फिल्में, अंडरवर्ल्ड की दुनिया का ग्लैमर, जासूसी और थ्रिल से भरपूर टीवी सीरियल भी बच्चों के कोमल मन पर उल्टा असर करते हैं। कहीं न कहीं ये सब बातें बच्चों को छोटी सी उम्र में ही गुनाह के लिये उकसाती हैं। ऐसे में गुनहगार की उम्र के कोई भी मायने नहीं रह जाते। जाहिर है, दोस्त के कातिल पिंटू को महज बाल सुधार गृह भेजने से ही सब कुछ ठीक नहीं हो सकता। जरूरत इस बात ही है कि बच्चों के लिये स्कूल और घर में ऐसा माहौल पैदा किया जाए कि वो अपराध की तरफ कदम बढ़ाना तो दूर, ऐसा सोच भी न सकें।

4 comments:

Ashok Kaushik ने कहा…

अरे रवींद्र जी, आपको एकाएक हो क्या गया है। देख रहा हूं कि इन दिनों आप साहित्य विमर्श कम, अपराध मनन अधिक कर रहे हैं। बिल्कुल क्राइम रिपोर्टर के अंदाज में। वाकई एक मासूम के गुनहगार बनने की ये सच्ची कहानी दिल दहला देने वाली है। गुनाह के दलदल में धंसते बचपन को देखकर यही याद आता है..बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर वो भी हम जैसे हो जाएंगे।
इसी से प्रभावित होकर नाचीज ने भी कुछ लिखा है। मुसाफिर से मुलाकात का वक्त लगे, तो एक नजर डालिएगा..

Mired Mirage ने कहा…

इस स्थिति के लिए हम ही जिम्मेदार हैं ।
घुघूती बासूती

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ये अचानक क्राइम रिपोर्टि्ग के पति रूझान कैसे बढ़ गया....?

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

अशेक जी, घुघूती बासूती जी और कंचन जी आशियाने पर आने के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। क्राइम की तरफ अचानक रूझान की बात नहीं है, बल्कि यह मेरे प्रोफेशन से जुड़ी मजबूरी है। अशोक जी मैं चैनल में क्राइम की खबर देखता हूं तो क्राइम से इतर सोचने का वक्त ही नहीं मिल पाता। कुछ साहत्यिक लिखना चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पाता।
वैसे मैं अपने पसंदीदा शौक यानी कवितायें लिखना बहुत मिस करता हूं। कोशिश करूंगा कि कुछ लिखूं। तब तक तो मेरे आशियाने पर आपको क्राइम स्टोरी ही झेलनी पड़ेंगी। लेकिन आपसे अनुरोध है कि आशियाने पर आना मत छोड़ दीजिएगा। वैसे कंचन जी व्यक्तिगत तौर पर मुझे क्राइम में कोई रूचि नहीं है, लेकिन क्या करें मजबूरी है।

 
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